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मेला हजरत गुलजार शाह का कल होगा उद्घाटन, जाने उनसे जुड़े दिलचस्प तथ्य

बिसवां सीतापुर: कौमी एकता और गंगा जमुनी तहजीब की जीती जागती मिसाल उर्स व मेला नुमाइश हजरत गुलजार शाह रह० अलैह का आगाज आज बुधवार से हो रहा है। एक माह से अधिक समय तक चलने वाले इस मेले में विभिन्न प्रकार के आयोजन मेला कमेटी द्वारा आयोजित कराये जाते हैं। उर्स के समय आयोजित होने वाले दंगल में शामिल होने भारत के कोने-कोने से कुश्ती के पहलवान यहां आते हैं। मशहूर भारतीय पहलवान स्वर्गीय दारा सिंह भी दरगाह पर आकर शीश झुका चुके हैं। मेले में शानदार जवाबी कव्वाली व आल इंडिया मुशायरा तथा नातिया मुशायरे का भी आयोजन किया जाता है। इस मेले में लगने वाली पशु बाजार काफी प्रसिद्ध है। हजरत गुलजार शाह उर्फ़ टक्करी बाबा की मजार हिन्दू मुस्लिम एकता की जीती जागती मिसाल है, हिन्दू हो या मुस्लिम सभी वर्ग के लोगो के लिए यह मजार आस्था का केंद्र रहा है। महान सूफी संत शैखुल औलिया हजरत गुलजार शाह रह० अलैह की मजार पर हर वर्ष दिसंबर में माह मेला लगता है। मेले में भारत के कोने कोने से लोग यहाँ आकर अकीदत के फूल चढाते हैं और मन्नते मांगते हैं। अपनी अलग पहचान रखने वाले इस मेले में प्यार, मोहब्बत, मेल-मिलाप और भाईचारे का दिलचस्प नजारा देखने को मिलता है। चुनाव के दौरान यहां राजनेताओं का जमावड़ा लगा रहता है। सभी राजनैतिक दलों के नेता हजरत गुलजार शाह मेला मैदान पर अपनी चुनावी जनसभा कराने को आतुर रहते हैं। चुनावी जनसभाओं से पहले नेतागण भाषण से पहले दरगाह में जाकर मजार पर फूल की चादर पेश करते हैं। जियारत के लिए यहां पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी, स्व. राजीव गांधी, डॉ. देवकांत बरुआ, पूर्व प्रधान मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह, पूर्व राज्यपाल मोहम्मद उस्मान आरिफ, राजेश कुमारी बाजपेयी, हेमवती नंदन बहुगुणा, राज्यपाल उत्तर प्रदेश सत्यनारायण रेड्डी, पूर्व मुख्यमंत्री स्व० मुलायम सिंह यादव, पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादवऔर पहलवान दारा सिंह, पूर्व कार्यवाहक मुख्यमंत्री अम्मार रिजवी आदि दिग्गज मजार पर अपनी खिराजे अकीदत पेश करने आ चुके हैं। पहले मेले का उद्घाटन जनपद के जिलाधिकारी के द्वारा किया जाता था परन्तु कुछ वर्षों से मेला कमेटी के बीच उपजे विवाद के चलते प्रशासनिक अधिकारियों ने मेले का उद्घाटन नही किया।




टक्करी बाबा की जीवनी


शैखुल औलिया हजरत गुलजार शाह रह० अलैह, जिन्हें लोग टक्करी बाबा के नाम से भी जानते हैं। इनकी पैदाइश जनपद बाराबंकी के ग्राम सैदनपुर में सन 1870ई० में एक साधारण परिवार में हुयी थी | बचपन से अध्यात्मिक शक्तियों से इनका नाता जुड़ गया। अपने गुरु की मृत्यु के पश्चात 21 वर्ष की आयु में ये बिसवां आकर बस गए और एक किसान के यहाँ रहकर उसके पशुओं की देखभाल आदि करते। यहीं पर उन्होंने अपनी कई करामाते दिखाई और कई बीमारों को शिफायाब भी किया और धीरे धीरे वह लोगो में काफी लोकप्रिय हो गए। कहा जाता है कि मोहल्ला दायरा निवासी एक अत्यधिक बीमार युवती को इन्होंने शिफ़ायाब किया था तबसे लोग इन्हे सूफी संत मानने लगे। उन्हें हर चीज में केवल खुदा का ही नूर दिखाई देता था। रास्ते में चलते समय वह लोगों को टक्कर मारते हुए चलते थे, जिसके चलते उनका नाम टक्करी बाबा पड़ गया था। वह अपने थैले से सभी लोगो को मिठाई बांटते थे। 1945 में पवित्र रमजान महीने के पहले ही दिन उनका इंतकाल हो गया था। इनकी मजार के लिए यदुवंशी राजाओं ने जमीन दान में दी थी तथा थवई टोला के थवई मिस्त्रियों ने इनकी मजार का निर्माण किया था जिसे बाद में मेला कमेटी के द्वारा जीर्णोद्धार करवाया गया।

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