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बिहार के बेगूसराय जिले के बछवाड़ा विधानसभा का चुनावी इतिहास

बछवाड़ा विधानसभा बेगूसराय जिले का अति संवेदनशील माना जाता है।क्षेत्र के चुनावी परिणाम के इतिहास पर नजर दें तो देश की आजादी के बाद पहली बार 1951 में बछवाड़ा विधानसभा क्षेत्र अपने अस्तित्व में आया।

1972 में बेगूसराय के जिला बनने से पहले बछवाड़ा मुंगेर जिले का हिस्सा हुआ करता था। आजादी के बाद हुए 1951 में संपन्न हुए निर्वाचन में कांग्रेस के प्रत्याशी स्वतंत्रता सेनानी मिट्ठन चौधरी इंडियन नेशनल कांग्रेस पार्टी की टिकट पर विजयी होकर विधायक बने। तब के परिवेश में राजनीति में उच्च जातियों का दबदबा था और पिछड़ी जातियां या दलित अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था।
1972 आते आते परिस्थियां बदली,लोहिया के नेतृत्व में चले समाजवादी आंदोलन ने पिछड़ों को भी जागृत किया और यादव,कुर्मी,कोयरी जैसी दबंग पिछड़ी जातियों ने राजनीति में हिस्सेदारी के लिए आगे आना शुरू किया।कांग्रेस ने बदली हुई राजनीतिक परिस्थिति को भांपते हुए बछवाड़ा विधानसभा क्षेत्र यदुवंशी बाहुल्य होने के कारण यादव कार्ड खेलते हुए 1972 के विधानसभा चुनाव में युवा उम्मीदवार रामदेव राय को अपना सियासी घोड़ा बनाया। श्री राय को उनके सर्वजातीय मतदाताओं का भरपूर समर्थन तो मिला ही, साथ ही क्षेत्र के पिछड़ा व सवर्ण पार्टी समर्थकों का भी भरपूर समर्थन प्राप्त हुआ।

लिहाजा 1972 के विधानसभा चुनाव में भारी मतों जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचे। यह वो दौड़ था जब बेगूसराय जिला मुंगेर से अलग हो कर अपने अस्तित्व में आया। कांग्रेस पार्टी का यह प्रयोग बिल्कुल कामयाब रहा। विपक्षी पार्टी सीपीआई ने यदुवंशी कुल में जन्मे अवधेश राय का यादव कार्ड खेला।
अगले चुनाव में सीपीआई के अवधेश राय ने बाजी मारी।1972 के बाद(एक बार अयोध्या प्रसाद को छोड़कर) बछवाड़ा विधानसभा पर यदुवंशियों का कब्जा बना रहा।
2020 के विधानसभा चुनाव में बेगूसराय से 2010 में भाजपा के टिकट पर चुने गए सुरेंद्र कुमार मेहता को उनकी इच्छा के विपरित बछवाड़ा का टिकट थमा दिया गया।बुझे मन से सुरेंद्र मेहता बछवाड़ा गए लेकिन इतिहास बना दिया।वामपंथ एवं कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले बछवाड़ा में पहली बार कमल खिल उठा।हालांकि उनकी जीत में कांग्रेस के बागी ,पूर्व विधायक रामदेव राय के पुत्र निर्दलीय गरीब दास ने अहम भूमिका निभाई।
इस तरह बछवाड़ा में पहली बार कमल ही नहीं खिला बल्कि 1972 से कायम यदुवंशियों के किले को भेदने का इतिहास भी बना।

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