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कार्तिक मास में उपवास की महिमा

हिन्दू धर्म के अनुसार कार्तिक माह,धर्म व दान का माह माना गया है इस माह में महिलाएं कठोर व्रत करती है।

द्वापर युग मे भगवान कृष्ण ने गोपियों के साथ अनेक लीलाएं की हैं । कृष्ण ने इन लीलाओं के माध्यम से लोगों को निष्काम प्रेम का संदेश दिया है। कृष्ण के अति प्रिय माह कार्तिक में महिलाएं एक माह का व्रत रखकर कठोर साधना करती हैं और भगवान कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम का इजहार करती हैं । इस माह में महिलाएं सुबह से कृष्ण भक्ति के गीत गाती हैं नदी पर स्नान करती है और ठाकुर जी का पूजन करती हैं ।

मान्यता है कि कृष्ण  छोटी दीपावली से अपनी बहिन के घर पर  टींका लगवाने जाते हैं और गोपियों से बिछुड़ जाते हैं कृष्ण को  गोपियां मंदिरों, नदी, घाटों, कदम्ब पेड़ पर ढूंढ़ती रहती हैं। आज भी इसी परंपरा के तहत महिलाएं कार्तिक में छोटी दिवाली से तृतीया तक पांच दिन अलग अलग तीर्थो में जाकर कृष्ण की आराधना करती हैं। इसी महीने अक्षय नवमी पर आँवला के पेड़ का पूजन कर उसी के नीचे प्रसाद ग्रहण करती हैं। विधि विधान से की गई यही कृष्ण भक्ति महिलाओं के मोक्ष का आधार बनती है।

व्रती महिलाओं की तिल जवा के द्वारा होती है कठिन परीक्षा 
जो महिलाएं इस व्रत का संकल्प लेती हैं उनको तिल जवा के दाने कपड़े में गांठ  बांधकर रखना होते हैं। उनको रोज स्नान करवा के उसकी पूजा की जाती है । एक माह पूर्ण होने पर उस गांठ को खोला जाता है यदि तिल जवा के दाने अंकुरित हो जाते हैं तो माना जाता है कि व्रत असफल हो गया यानी साधना खण्डित मानी जाती है वहीं दाने अंकुरित न होने का अर्थ साधना सफल मानी जाती है। इस परीक्षा परिणाम के भय से महिलाएं व्रत में कोताही नहीं बरतती हैं।

ग्राम के आसपुर स्कूल के पास कृष्ण ने छेड़ीं थीं गोपिकाएं
किवदंती है कि सभी गांव की गोपिकाएं कृष्ण को ढूंढने खोड़ के पास स्थित प्राचीन धाय महादेव मंदिर आईं तो उन्हें लौटते समय आसपुरा ग्राम में  कृष्ण रूप में सखा मिल गए जो उन्हें बहुत देर तक रोके रहे। 
                                                  प्रस्तुति-धर्मेन्द्र कुमार लोधी
                                                          शिवपुरी (मध्य प्रदेश)

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