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सतगुरु श्री कबीर साहेब पर विश्वास

#विश्वास...❤️💐👍

एक भक्त था जिसे अपने साहब पर अपार श्रद्धा और दृढ़ विश्वास था, वो अपने भक्ति पर इतना अडिग था कि चाहे कुछ भी हो जाए उसका विश्वास नहीं डगमगाता था|
और होना भी वही चाहिए जिस भक्त को अपने साहब पर विश्वास न हो वो भक्त कैसा?
और साहब के कृपा से उसके घर में धन धान्य की भी कुछ कमी न थी| कोई भी याचक कभी उसके द्वार से खाली हाथ लौटकर न जाता था|

उसके इस अपार श्रद्धा और अनन्य भक्ति भाव को देखकर, साहब ने एक दिन उसे दर्शन दिया|
साहब के दर्शन मात्र से भक्त धन्य-धन्य हो गया, आज उसकी श्रद्धा और भक्ति फलित हुई थी कि साहब स्वयं ही दर्शन देने चले आए, भक्त भाव विभोर हो उठा, भक्ति भाव से ओतप्रोत उसने साहब की आरती उतारी चरणामृत उतारी तथा साहब के चरणों में नतमस्तक हो गया और साहब से कहा- "हे दाता! ये मेरा परम सौभाग्य है कि आपने मुझ पतित को दर्शन दिया, हे दयालु!! मैं आपके चरणों में समर्पित हूं आप आज्ञा करें मैं आपकी सेवा में प्रस्तुत हूं|"

साहब उसके इस बात का कोई उत्तर न देकर सिर्फ मंद मंद मुस्कुरा दिए और कहा- "वत्स मैं तुम्हारे श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होकर ही तुम्हे दर्शन देने आया हूं| मांगों क्या चाहते हो?" भक्त ने विनम्र होकर कहा- "हे दाता! मैंने आपकी भक्ति के सिवाय कभी कुछ नहीं चाहा, फिर भी अगर आप कुछ देना चाहते हैं तो मुझे यह वरदान दें कि समय कैसा भी हो आप मेरा मेरा साथ न छोड़ें| आपका आशीष सदैव मुझ पर बना रहे|

साहब तथात्सु कहकर अतंर्ध्यान हो गए, अब वह भक्त जब भी पैदल चलता था दो नहीं चार कदमों के निशान होते थे| दो खुद के और दो साहब के| समय बीता तकदीर पलटी, काल चक्र कुछ ऐसा चला कि वो कंगला हो गया सड़क पर आ गया, हां पर सिर्फ धन से ही वो कंगला हुआ था भक्ति भाव से नहीं| इन मुश्किल दिनों में भी साहब के प्रति उसकी श्रद्धा भक्ति और विश्वास कम नहीं हुई ऐसे भक्त बिरले ही होते हैं|

एक दिन प्रातः काल समुद्र तट पर टहलते हुए उसने ग़ौर किया कि क़दमों के निशान सिर्फ दो हैं| वो हैरान और आवाक रह गया, उसने सोचा कि इस संकट की घड़ी में साहब ने भी मेरा साथ छोड़ दिया| पर ऐसा बिलकुल नहीं था यह उसकी ग़लतफहमी थी| पर जो भी हो साहब के प्रति उसकी श्रद्धा भक्ति और विश्वास बना रहा| समय ने फिर करवट ली, उसके दिन बहुरे कुछ ही दिनों में वह फिर धन धान्य से परिपूर्ण हो गया| कदमों के निशान भी चार दिखने शुरू हो गए|

एक दिन सांध्य पूजा की बेला में साहब ने भक्त को फिर दर्शन दिया और पूछे- "कहो वत्स कैसे हो? सब कुशल मंगल जीवन में कोई कष्ट तो नहीं?" जीवन में इतने उतार चढ़ाव के बाद साहब के दर्शन पाकर वह गदगद हो गया, उसके नेत्रों से आंसू छलक आए, वह लड़खड़ाते हुए बोला- "हे दयाल! आपके रहते मुझे जीवन में क्या कष्ट हो सकता है?" पर मुझे आपसे एक शिकायत है जब मैं मुश्किल समय से गुजर रहा था आपने भी मेरा साथ छोड़ दिया था| साहब मुस्कुराने लगे और कहा- "वत्स! किसने कहा कि मैंने तुम्हारा साथ छोड़ दिया था? मैं तो सदा तुम्हारे साथ था|

भक्त ने कहा- "अगर ऐसा था तो मेरे मुश्किल के वक्त में मेरे कदम चार की जगह सिर्फ दो ही क्यों थे?"
साहब ने मुस्कुराते हुए कहा- "अच्छा ऐसी बात है अब मैं समझा, वत्स ऐसा है कि मुश्किल की घड़ी में तुझे जो दो कदमों के निशान दिखते थे वो तेरे नहीं बल्कि मेरे थे, जब तुम्हारे क़िस्मत ने पलटी मारी थी तुम्हारे कदमों के निशान गायब हुए थे क्योंकि नियति ही वैसी थी, और जिन्हें तुम खुद के कदमों के निशान समझ रहे हो वो मेरे थे|

इतना सुनते ही भक्त के सज़ल नेत्रों से अश्रु धारा बह निकली, उस दिन भी उसने साहब के चरण पखारे पर जल से नहीं अपने अश्रुओं से...
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