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नीतीश कुमार के आमंत्रण पर मीसा भारती ने कह डाली बड़ी बात

आप को बता दूं चूड़ा-दही भोज पर नीतीश के निमंत्रण पर कहा…मुझे कोई जानकारी नहीं…अभी बदलाव की बात करना होगा जल्दबाजी
पटना। आप को बता दूं कि मकर संक्रांति का पर्व देशभर में धूमधाम से मनाया जा रहा है। बिहार में इस पर्व का एक खास महत्व है, जहां दही-चूड़ा भोज न केवल पारंपरिक उत्सव है बल्कि राजनीति का एक अहम हिस्सा भी बन गया है। हर साल की तरह इस बार भी मकर संक्रांति के अवसर पर दही-चूड़ा भोज के आयोजन ने सियासी हलचल तेज कर दी है। नेताओं ने अपने-अपने आवास और पार्टी कार्यालयों में दही-चूड़ा भोज का आयोजन किया, जहां एक ओर यह नेताओं के आपसी संवाद का माध्यम बनता है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक समीकरणों के संदेश देने का भी जरिया बन जाता है। इसी क्रम में, राबड़ी देवी के आवास पर भी दही-चूड़ा भोज का आयोजन किया गया, जिसे लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म रहा। इस आयोजन में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को आमंत्रित किए जाने के सवाल पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) नेता और सांसद मीसा भारती ने कही कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने राजनीति के अस्थिर और अनिश्चित स्वभाव पर टिप्पणी करते हुए कही, “राजनीति कयासों का खेल है, जहां कभी भी कुछ भी हो सकता है। लेकिन अभी किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की बात करना जल्दबाजी होगी। राबड़ी आवास पर आयोजित भोज के बारे में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने कहा कि भाजपा को इस आयोजन में आमंत्रित नहीं किया गया। उन्होंने कहा, “हम तो अपने आयोजनों में सभी को बुलाते हैं, लेकिन हमें राबड़ी आवास पर भोज के लिए निमंत्रण नहीं मिला।” उनकी इस टिप्पणी से भोज के आयोजन को लेकर राजनीति में मतभेद और प्रतिस्पर्धा की झलक मिलती है। दही-चूड़ा भोज के माध्यम से नेताओं के बीच न केवल व्यक्तिगत मेलजोल बढ़ता है, बल्कि इसे सियासी समीकरणों को मजबूत करने का अवसर भी माना जाता है। हर बार की तरह, इस साल भी भोज का आयोजन सियासी हलकों में चर्चा का विषय बना रहा। मीसा भारती के बयान और भाजपा की प्रतिक्रिया यह संकेत देते हैं कि बिहार की राजनीति में हर कदम का एक गहरा अर्थ होता है। ऐसे आयोजनों के जरिए राजनीतिक दल अपनी शक्ति और सामंजस्य दिखाने की कोशिश करते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि मकर संक्रांति पर दही-चूड़ा भोज बिहार की राजनीति का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है। यह न केवल त्योहार की परंपरा को जीवित रखता है, बल्कि इसमें छुपे राजनीतिक संदेश सियासी रणनीति को भी उजागर करते हैं। इन आयोजनों के जरिए प्रदेश की राजनीति में समीकरणों और संभावित बदलावों की झलक देखी जा सकती है।

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