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समाज और परिवार से प्रताड़ित होता युवा

परिवार और समाज द्वारा प्रताड़ित एक व्यक्ति

जो बाबा है भी और नहीं भी ... जिसका लक्ष्य भी है और नहीं भी ... जिसे समझना आसान भी है और कठिन भी ... वह सबकुछ भी जानता है और उसे पता कुछ भी नहीं ... जो नासमझ भी है और सबसे समझदार भी ...

गलत ये नहीं कि वो बाबा बना या तपस्या कर रहा है ... भगवान की शरण जाना बहुत अच्छी बात है और भाग्यशाली लोग ही ये रास्ता चुन पाते हैं ... गलत है उन्हें इसमें धकेलना ...
अभय सिंह की बातों से लगता है कि उन्हें बाबा कभी बनना ही नहीं था ... उन्हें धकेला गया है बाबा बनने के लिए ... उन्हीं के अपने परिवार के द्वारा

क्यों बनना पड़ा बाबा ? क्या वो भी संसार में रहकर अपना जीवन सुखमय व्यतीत नहीं कर सकता था ? ... मैं ये नहीं कह रहा हूं कि वो अभी सुखी नहीं ... बहुत सुखी है अभी वह लेकिन क्या कभी उसे ये सुख चाहिए था ??

अब मैं जो लिखने जा रहा हूं हो सकता है वो आपको बुरा लगे ... लेकिन सच्चाई कड़वी होती है .. और सच्चाई ये है कि आजकल के 90% मां बाप का बेटो से रिश्ता भावनात्मक रहा ही नहीं है ....

पृथ्वी पर पुरुष के रूप में जन्म होते ही मां बाप को खुशी होती है कि बेटा हुआ है...
खुशी उसके जन्म लेने की नहीं बल्कि खुशी में स्वार्थ निहित है .... "मेरे बुढ़ापे का सहारा पैदा हुआ है ... बड़ा होकर ये बनेगा ... वो बनेगा ... मुझे कमाकर देगा .. मैं सुखी रहूंगा ..." यही तो सोच है 90% मां बाप की ...

सब कहते हैं मेरा बेटा बड़ा होगा तो मैं सुखी रहूंगा ... ये क्यों नहीं कहते कि इसे इतना काबिल बनाऊं कि ये सुखी रहेगा ?..
नहीं कहेंगे क्योंकि बच्चे बड़े करने में भी स्वार्थ निहित है ...
यदि ये पता चलने का कोई सिस्टम होता कि बड़ा होकर बच्चा क्या बनेगा और कितना कमाएगा ... और पता चल जाता की बड़ा होकर कुछ नहीं बन पाएगा तो यकीन मानो उसका तभी से गला घोंट देते जैसे पहले लड़कियों के पैदा होने पर और आजकल गर्भ में लिंग का पता चलने पर घोंट दिया जाता है ...

कड़वा है पर सच यही है ...

स्वार्थ से परिपूर्ण होकर ही उसे बड़ा किया जाता है ... उसे पढ़ाया जाता है या काम सिखाया जाता है ... उसको कहा जाता है कि बेटा पढ़कर तुझे डॉक्टर , इंजीनियर या बड़ा आदमी बनना है ... इसलिए नहीं कि वो सुखी रहेगा बल्कि इसलिए कि बड़ा होकर कुछ बनेगा तो उनका समाज में नाम होगा ...

कितने मां बाप है जिन्हें बेटों से कोई उम्मीद नहीं ...
मुश्किल से 10% लेकिन ज्यादा संख्या तो स्वार्थी मां बाप की है न ...

क्यों कहा जाता है कि मां बाप ने दुनिया दिखाकर एहसान किया ... क्या वे नहीं होते तो तुम ना हो पाते ?
दुनिया दिखाई केवल अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए ...

केवल बेटों से ही क्यों कहा जाता ही कि तुमने अपने मां बाप के लिए क्या किया ? मां बाप से ये क्यों नहीं कहा जाता कि तुमने अपने बेटों के भविष्य के लिए क्या किया ?
क्या उन्हीं माता पिता ने उनके माता पिता के लिए कुछ किया था ?

अच्छे बेटे बनना मत सिखाओ ... अच्छे मां बाप बनना सिखाओ ... मां बाप अच्छे होंगे तो बेटे स्वत अच्छे हो जाएंगे ...

और जब तक अच्छे मां बाप नहीं बनना सिखाया जाएगा तब तक अच्छे बेटों की उम्मीद करना भी बेकार है ...
जन्म देने मात्र से कोई भगवान नहीं होता ... जन्म तुमने तुम्हारे स्वार्थ के लिए दिया है ...

पेट तो कुत्ते बिल्ली भी पाल देते है ... बेटे तो वे भी पैदा कर देते हैं ... लेकिन तुममें और उनमें फर्क है ...

मत थोपो अपनी संतानों पर भार ... उन्हें घोड़े या गधे मत बनाओ ... ना पाल सको तो मत पैदा करो ... कोई तुम्हे आकर नहीं कहता कि मुझे दुनिया में आना है ....

स्वार्थ और सिर्फ स्वार्थ ...
जन्म देते हो तो उसे काबिल भी बनाओ ... और न कर सको ऐसा तो मत दिखाओ उसे दुनिया ... कुछ फर्क न पड़ेगा ... तुम्हारे कितने पूर्वज चले गए ... कितनो को याद रख पा रहे हो ?

बेटों की योग्यता उनकी कमाई से नापी जाती है ...
इस बात से नापी जाती है कि वो उनके हाथ में कितने नोट थमाता है ? ...

अरे बंद करो ये सब ढकोसले ...

अच्छे बेटे नहीं अच्छे मां बाप बनना सिखाओ और ऐसा न कर पाओ तो अगले कुंभ में कोई और अभय सिंह मिल जाए तो आश्चर्य मत करना ...

जय श्री राम ..

- भैराराम जांगिड़ TBD

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