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घुसपैठियों की पैठ

आजकल पटना की सड़कों पर प्लास्टिक के खिलौने और अन्य छोटे-मोटे सामान बेचने वाले कुछ लोगों की गतिविधियां संदेह के घेरे में हैं। इन लोगों की भाषा, पहनावा और बोलचाल स्वाभाविक नहीं लगती। वे टूटी-फूटी हिंदी बोलते हैं और कुछ हद तक बांग्ला जैसी भाषा का प्रयोग करते हैं, लेकिन यह भारतीय बंगाली भाषा से भिन्न प्रतीत होती है।देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए अवैध घुसपैठ एक गंभीर समस्या बन चुकी है। जैसे ही रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की उपस्थिति पर चर्चा होती है, कुछ लोगों को परेशानी होने लगती है। लेकिन यह साफ़ है कि देश से बड़ा कुछ नहीं है और भारत में अवैध घुसपैठियों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
यह एक जांच का विषय है कि ये लोग कहां से आए हैं, कहां रहते हैं, और इन्हें बिहार में धीरे-धीरे कौन फैला रहा है। विशेष रूप से साइकिल पर पटना की गलियों में घूमकर प्लास्टिक का सामान बेचने वाले ये लोग सुरक्षा एजेंसियों के संदेह के दायरे में हैं। उनकी पहचान और गतिविधियों की गहन जांच होनी चाहिए, ताकि किसी भी संभावित खतरे को समय रहते रोका जा सके।

देश की सुरक्षा सर्वोपरि है, और इस मुद्दे को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

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