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भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेई जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर पोखरण परमाणु विस्फोट के फलस्वरुप वैश्विक स्तर पर भारत के सशक्तिकरण पर प्रभाव विषय पर व्याख्यान कार्यक्रम

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर के रक्षा एवं स्त्रातजिक अध्ययन विभाग द्वारा आज दिनांक 10 में 2025 को भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेई जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर *“पोखरण परमाणु विस्फोट के फलस्वरुप वैश्विक स्तर पर भारत के सशक्तिकरण पर प्रभाव”* विषय पर व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
“भारत ने दुनिया को युद्ध नहीं बुद्ध दिया है व जब भी भारत को युद्ध व बुद्ध में से किसी एक को चुनना होगा तो वह बुद्ध को चुनेगा क्योंकि यह भारत की मानवता और करुणापूर्ण भावना तथा शांति का प्रतीक है”। ये बातें आज के व्याख्यान के मुख्य वक्ता प्रोफेसर ओम प्रकाश सिंह, प्राचार्य दिग्विजय नाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय गोरखपुर द्वारा कही गई। उन्होंने भारत की नाभिकीय नीति के संबंध में वर्तमान परिदृश्य पर प्रकाश डालते हुए भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई जी की इन लाइनों को दोहराया कि जब जनता की आकांक्षाएं बढ़ जाती हैं तो सत्ता में बैठे लोगों को सजग और संवेदनशील हो जाना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि भारत प्रारंभ से ही शांति का पक्षधर रहा है तथा भारत की नीति सदैव से गुटनिरपेक्षता तथा पंचशील पर आधारित रही है परंतु भारत पर पड रहे अंतरराष्ट्रीय दबाव एवं पास में मौजूद चीन जैसे आणविक शक्ति संपन्न शत्रु के कारण परमाणु परीक्षण करना भारत के लिए आवश्यक आवश्यकता बन गया था और इस आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए भारत ने 1974 में अपना प्रथम परमाणु प्रशिक्षण संपन्न किया। उन्होंने दुनिया में परमाणु शक्ति की उत्पत्ति से लेकर के भारत द्वारा 1974 में किए गए प्रथम परमाणु परीक्षण ‘बुद्ध मुस्कुराए’ पर प्रकाश डाला तथा इस दौरान भारत के समक्ष उत्पन्न चुनौतियां एवं भू- राजनीतिक दबावों का भी विस्तार से वर्णन किया तथा कहा कि जब तक भारत ने परमाणु परीक्षण नहीं किया था विश्व मंच पर भारत की बातों को उतनी अहमियत नहीं दी जाती थी परंतु भारत द्वारा 1974 में परमाणु परीक्षण करने के बाद इस स्थिति में परिवर्तन आया और भारत को विश्व मंच पर ज्यादा अहमियत दी जाने लगी। उन्होंने आगे कहा कि भारत में जहां इस परीक्षण को नाभिकीय परीक्षण नाम दिया तो वही पश्चिमी शक्तियों ने इसे परमाणु विस्फोट नाम से संबोधित किया और इसके पीछे का कारण उनकी वैचारिकता रही परंतु भारत ने यह साबित किया कि यह परीक्षण उसके ऊर्जा जरूरतों एवं नागरिक आवश्यकताओं के लिए था न कि नाभिकीय हथियार बनाने के लिए परंतु इसके बाद दुनिया में उत्पन्न हुई सामरिक चुनौतियां एवं 1990 में USSR के विखंडन के बाद उत्पन्न परिस्थितियों के बाद 1998 में 11 व 13 मई को भारत ने पोखरण में पांच लगातार परमाणु परीक्षण करके अपने को पूर्ण नाभिकीय शक्ति संपन्न राष्ट्र घोषित कर दिया। इसके बाद पश्चिमी शक्तियों, अमेरिका व दुनिया के अन्य राष्ट्रों द्वारा भारत पर कई तरह के प्रतिबंध भी लगाए गए परंतु भारत ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति , कुशल नेतृत्व व नागरिकों के समर्पण के बल पर इन सभी प्रतिबंधों का न सिर्फ सफलतापूर्वक सामना किया बल्कि दुनिया को भारत पर से इन प्रतिबंधों को हटाने के लिए मजबूर भी होना पड़ा। इस घटना पर उन्होंने कहा कि पश्चिमी शक्तियों की प्रारंभ से ही भारत की उपलब्धियां पर संशय करने की रणनीति रही है।
इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे रक्षा अध्ययन विभाग के अध्यक्ष प्रो. विनोद कुमार सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि वर्तमान समय में भारत ही नहीं विश्व के सभी नाभिकीय शक्ति संपन्न देश कभी भी एक दूसरे के ऊपर नाभिकीय हथियार का प्रयोग नहीं करेंगे क्योंकि इन हथियारों की विनाशक क्षमता इतनी ज्यादा है कि अगर किसी एक राष्ट्र ने इसका प्रयोग किया तो इससे न सिर्फ लक्षित राष्ट्र अपितु प्रयोगकर्ता राष्ट्र भी पूर्ण रूप से नष्ट हो जाएगा। यही कारण है कि 6 व 9 अगस्त 1945 के बाद इन हथियारों का दुबारा प्रयोग नहीं हुआ। इसके लिए एक कूट शब्द मैड ( म्यूचुअल एश्योर्ड डिस्ट्रक्शन) का इस्तेमाल किया जाता है जिसकी उत्पत्ति अफ्रीका के दो जहरीले सांपों के आपसी लड़ाई से उत्पन्न हुई है जो आमने-सामने की लड़ाई में कभी एक दूसरे को काटते नहीं है बल्कि सिर्फ फूफकारते हैं क्योंकि अगर वे एक दूसरे को काट लेंगे तो इससे दोनों की मृत्यु हो जाएगी। इस कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन विभाग के वरिष्ठ आचार्य प्रो श्रीनिवास मणि त्रिपाठी ने किया और कार्यक्रम का संचालन विभाग की सहायक आचार्य डॉ आरती यादव ने किया। इस अवसर पर गणित विभाग के अध्यक्ष प्रो. विजय शंकर वर्मा, मध्यकालीन इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो. मनोज त्रिपाठी, प्रो. सतीश चंद्र पांडेय, प्रो. हर्ष कुमार सिन्हा, डॉ. आमोद राय, डॉ श्रीप्रकाश सिंह, डॉ प्रवीण कुमार सिंह, डॉ जितेंद्र कुमार, डॉ विजय कुमार, डॉ अभिषेक सिंह, डॉ आशीष सिंह, डॉ शुभ्रांशु शेखर सिंह एवं विश्वविद्यालय के शोध छात्र-छात्राएं तथा स्नातक व स्नातकोत्तर के छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

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