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खुद सोचो, खुद भरो!

श्रीमती शर्मा (शर्मा मैडम) विज्ञान की शिक्षिका हैं—जागरूक, समर्पित और हमेशा कुछ नया सिखाने को तैयार। हर दिन की तरह आज भी शनिवार की सुबह वे पहले ऑटो और फिर बस से स्कूल के लिए निकलीं। बस में उनके पास बैठा एक यात्री क्रॉसवर्ड भर रहा था। उसे देखकर श्रीमती शर्मा के मन में एक विचार कौंधा—क्यों न बच्चों के लिए भी कुछ ऐसा तैयार किया जाए जो उन्हें सोचने पर मजबूर करे?

स्कूल पहुँचने से पहले वे पास की फोटो कॉपी की दुकान पर उतरीं और हाथ से बनाए गए प्रश्न-पत्र को प्रिंट करवाया। भीड़ ज़्यादा थी, इसलिए स्कूल पहुँचने में थोड़ी देर हो गई। दौड़ते-भागते वे क्लास में पहुँचीं, मुस्कराकर बच्चों को "गुड मॉर्निंग" कहा और वर्कशीट बाँट दी—जिसमें खाली स्थान थे।

रिया, कक्षा आठवीं की छात्रा है,जिसे पढ़ाई से डर तो नहीं लगता है लेकिन जब भी वर्कशीट में खाली जगहें देखती, उसका माथा ठनक जाता। उस दिन भी उसने वर्कशीट को उलट-पलट कर देखा और सोचा (गई भैंस पानी में- मन में सोचा) अब तो पढ़ना है और उत्तर भी लिखना है, “चलो पढ़ तो लें, लिखा क्या है?”

उसने पढ़ा:
"पौधे ______ की मदद से खाना बनाते हैं।"

"न कोई ऑप्शन, न कोई हिंट!" रिया ने मन ही मन कहा। लेकिन फिर उसे पिछली क्लास की बातें याद आईं। उसने आत्मविश्वास से लिखा—**प्रकाश संश्लेषण**—और ऐसे तनकर बैठ गई जैसे कोई बड़ी जंग जीत ली हो।

श्रीमती शर्मा ने उसकी कॉपी देखी, मुस्कराईं और कहा, “Good!”

उनका नया तरीका—**"खुद सोचो, खुद भरो!"**—शुरुआत में बच्चों को थोड़ा मुश्किल ज़रूर लगा, लेकिन अब यह एक मज़ेदार चुनौती बन चुका था। रिया ही नहीं, पूरी कक्षा अब हर खाली स्थान को एक अवसर की तरह देखने लगी थी।

कभी-कभी, सबसे अच्छी सीख वहीं होती है , जहाँ हमें खुद से जवाब ढूँढना पड़े।

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