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जिसने एक जान बचाई, उसने पूरी इंसानियत को बचाया (क़ुरआन 5:32)

निमिषा प्रिया की जान बची, लेकिन सिर्फ इंसानी कोशिशों से नहीं बल्कि शरीयत-ए-मुतहर्राह (इस्लामी कानून) की रहमत और हिकमत की वजह से।

जब यमन में मौत की सज़ा तय हो चुकी थी, तभी एक रास्ता दिखा शरीयत का वो कानून जो “दिया (blood money) और माफ़ी” की इजाज़त देता है।

सूरह अल-बक़रह, आयत 178 में अल्लाह फरमाता है:
“ऐ ईमान वालों! तुम पर क़त्ल किए जाने वालों के बदले क़िसास (इंसाफ़) लिखा गया है… लेकिन अगर कोई माफ़ कर दे, तो यह उसके लिए कफ़्फ़ारा (गुनाहों का प्रायश्चित) होगा…”

मुफ़्ती मक़सूद अहमद क़ासमी साहब (दारुल उलूम, देवबंद) ने इस मामले में शरीयत के हवाले से साफ़ कहा:
“इस्लामी शरीयत में क़िसास के साथ-साथ माफ़ी और ‘दिया’ का दरवाज़ा भी खुला है, और यही दरवाज़ा इंसानियत की भलाई का रास्ता बनता है।”

पीड़ित के परिवार ने जब क़ुरआन की आयत और शरीयत के उसूलों को समझते हुए माफ़ किया, तो एक जान बच गई। यह इस्लाम की रहमत और इंसाफ़ की सबसे बड़ी मिसाल है।

आज ज़रूरत है कि दुनिया शरीयत को सिर्फ़ सज़ा देने वाला कानून न समझे, बल्कि वो रहमत, इंसाफ़ और इंसानियत की हिफ़ाज़त करने वाला मुक़द्दस निज़ाम है।क़ुरआन, शरीयत और मुफ़्ती हज़रात की रहनुमाई से हम आज भी इंसानियत को बचा सकते हैं, बस हमें समझने की ज़रूरत है, जोड़ने की नहीं तोड़ने की ।

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