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विश्व हिन्दू महासंघ ने धूमधाम से मनाई मुंशी प्रेमचंद जयंती

गोरखपुर ।विश्व हिन्दू महासंघ गोरखपुर द्वारा हिंदी साहित्य के शिखर पुरुष मुंशी प्रेमचंद की जयंती आज उनके गोरखपुर, बेतियाहाता स्थित ऐतिहासिक आवास, मुंशी प्रेमचंद पार्क में गरिमामय और साहित्यिक उत्साह के साथ मनाई गई। इस अवसर पर उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर साहित्य और समाज सुधार में उनके अमर योगदान को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम में गोरखपुर के गणमान्य साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनेताओं ने भाग लिया, जिनमें वरिष्ठ भाजपा नेता राधेश्याम श्रीवास्तव, भाजपा नेता शिवकुमार शर्मा, विश्व हिंदू महासंघ के प्रदेश सह कोषाध्यक्ष व जिला अध्यक्ष इं. राजेश्वर प्रसाद विश्वकर्मा, क्षेत्रीय महामंत्री श्याम बाबू शर्मा, प्रदेश उपाध्यक्ष लीला श्रीवास्तव, प्रदेश मंत्री सपना श्रीवास्तव, जिला अध्यक्ष मातृशक्ति दीपमाला शर्मा, जिला उपाध्यक्ष संतोष विश्वकर्मा, मुंशी प्रेमचंद स्मृति संस्था के पुस्तकालयाध्यक्ष बैजनाथ मिश्रा, प्रख्यात साहित्यकार संजय कुमार गुप्त ‘अबोध’, प्रिया यादव, सर्वेश मिश्रा, शिवम सहित अनेक विशिष्टजन उपस्थित थे।

कार्यक्रम का प्रारंभ पार्क में स्थित मुंशी प्रेमचंद जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण से हुआ। इस अवसर पर एक विचारगोष्ठी भी आयोजित की गई। देवरिया से पधारे प्रख्यात साहित्यकार संजय कुमार गुप्त ‘अबोध’ के एकांकी नाटक के भावपूर्ण वाचन से हुआ, जिसने प्रेमचंद की साहित्यिक शैली की गहनता को जीवंत किया। श्याम बाबू शर्मा ने प्रेमचंद के 1916 से 1921 तक के गोरखपुर प्रवास की स्मृतियों को साझा करते हुए उनके रचनात्मक काल की परिस्थितियों को उजागर किया। इं. राजेश्वर प्रसाद विश्वकर्मा ने प्रेमचंद के उपन्यासों के पात्रों की गहराई और उनके सामाजिक संदर्भों पर विचारोत्तेजक चर्चा की। राधेश्याम श्रीवास्तव ने ‘निर्मला’, ‘दो बैलों की जोड़ी’, ‘ईदगाह’ और ‘कफन’ जैसी कालजयी रचनाओं के माध्यम से प्रेमचंद की सामाजिक यथार्थवादिता और मानवीय संवेदनाओं को रेखांकित किया। शिवकुमार शर्मा ने प्रेमचंद के साहित्य में अंग्रेजी शासन के खिलाफ निहित प्रतिरोध और स्वाधीनता की भावना पर प्रकाश डाला। प्रिया यादव ने प्रेमचंद के साहित्य में सामाजिक यथार्थ के सशक्त चित्रण की प्रशंसा करते हुए उनकी रचनाओं को आधुनिक समाज के लिए प्रासंगिक बताया।

इस आयोजन से न केवल प्रेमचंद की साहित्यिक विरासत को जीवंत करने में मदद मिली, बल्कि उनके सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना के विचारों को नवीन पीढ़ी तक पहुँचाने का सशक्त प्रयास किया गया।

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