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एथेनॉल नीति: जनता का फायदा या किसी खास का खेल?

हाल ही में पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने की नीति पर काफी चर्चा हो रही है। सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी जी इस विषय पर लगातार सक्रिय रहे, जबकि पेट्रोलियम मंत्री हर्डीप सिंह पुरी का सीधा मंत्रालयीय दायित्व था। सवाल यह उठता है कि एथेनॉल पर इतना फोकस आखिर क्यों किया गया और जनता को इसकी पूरी प्रोफाइल क्यों नहीं बताई गई।

1. नितिन गडकरी और एथेनॉल का रिश्ता

गडकरी जी का मंत्रालय सीधे ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री, वाहन ईंधन मानक और परिवहन नीति से जुड़ा है।

गाड़ियों के लिए फ्यूल ब्लेंडिंग का मानक तय करना उनके मंत्रालय के अधीन आता है।

एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल गाड़ियों में इस्तेमाल होगा, इसलिए वे इस पर ज्यादा मुखर रहे।

राजनीतिक दृष्टि से भी महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में गन्ना किसानों का वोट बैंक इस नीति से प्रभावित होता है।


2. किसानों और उद्योगपतियों को लाभ

एथेनॉल मुख्य रूप से गन्ना, शीरे (Molasses) और मक्का से बनाया जाता है।

गन्ने की अधिक खपत होने से किसानों को लाभ मिलता है, लेकिन असली बड़ा फायदा शुगर मिल मालिकों और डिस्टिलरी उद्योग को होता है।

यह भी सच है कि कई बड़े उद्योगपति और राजनेता इन मिलों से जुड़े हुए हैं।


3. जनता से छुपा सच

जनता को सिर्फ यह बताया गया कि एथेनॉल से प्रदूषण कम होगा और आयातित तेल पर निर्भरता घटेगी।
लेकिन असली प्रोफाइल छिपाई गई:

पेट्रोल की कीमत कम क्यों नहीं हुई?

गाड़ियों की माइलेज 5–10% तक घटती है।

इंजन पर दीर्घकालिक असर हो सकता है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एथेनॉल की लागत अक्सर पेट्रोल से ज्यादा पड़ती है।


4. फायदा और नुकसान

पक्ष फायदा नुकसान

सरकार आयातित तेल का बिल घटता है, पर्यावरण हितैषी छवि बनती है पेट्रोल सस्ता करने की बाध्यता नहीं
किसान गन्ने की अतिरिक्त खपत, आय का नया स्रोत केवल गन्ना क्षेत्र के किसानों तक सीमित लाभ
उद्योगपति शुगर मिल और डिस्टिलरी से मोटा मुनाफा प्रतिस्पर्धा कम, जनता पर बोझ
आम जनता प्रदूषण थोड़ा कम माइलेज घटा, कीमत वही, इंजन पर असर


5. निष्कर्ष

एथेनॉल नीति का वैज्ञानिक और पर्यावरणीय आधार तो सही है, लेकिन पारदर्शिता की कमी ने जनता में अविश्वास पैदा किया है। यह सवाल वाजिब है कि अगर पेट्रोल में 20% सस्ता एथेनॉल मिलाया गया है, तो आम उपभोक्ता को उसका लाभ क्यों नहीं दिया गया?

दरअसल, यह नीति किसानों की मदद से ज्यादा उद्योगपतियों और राजनीतिक हितों से जुड़ी दिखाई देती है। जनता को केवल "देशहित" और "पर्यावरण" की तस्वीर दिखाई गई, जबकि असली आर्थिक लाभ सीमित वर्ग तक पहुँच रहा है।

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