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सी पी राधाकृष्णन उप राष्ट्रपति

सी पी राधाकृष्ण देश के नए उप राष्ट्रपति, एन डी ए की जीत,,,
हैरत की बात ये नहीं कि एन डी ए के उम्मीदवार सी पी राधाकृष्ण चुनाव जीत गए। लोक सभा और राज्य सभा सदस्यों की गिनती में इंडिया गठबन्धन के सदस्यों से एन डी ए सदस्यों की गिनती ज्यादा थी, लिहाज़ा ये जीत हैरानकुन नहीं थी लेकिन विपक्ष यानी इंडिया अलाइंस के 20 सांसदों ने एन डी ए उम्मीदवार के हक़ में वोट दिया ये इंडिया अलाइंस केलिए फ़िक्र की बात होनी चाहिए। लेकिन मेरे लिए ये भी हैरान करने वाली बात नहीं है।

मैं जनता और समझता हूं कि अगर वोट देने वाले की पहचान निश्चित है तो उसका एन डी ए के साथ जाना हैरानी की बात नहीं है क्योंकि उन तक सत्ताधारी पार्टी की पहुंच आसान है। हां लेकिन राहुल गांधी समेत सभी इंडिया अलाइंस के पार्टी लीडरान को ये सोचना और समझना होगा कि उनकी पार्टीयों के टूटने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

और ये पहला मौक़ा नहीं है जब पार्टियां टूटी हैं कांग्रेस ने पार्टी टूट की वजह से अपनी राज्य सरकारें गंवाई हैं दूसरी पार्टियों में भी टूट होती रही है लिहाज़ा बात निराश होने की नहीं गंभीर चिंतन मनन यानी गौर ओ फ़िक्र की है।

बिहार के पिछले चुनाव में भी जन समर्थन तेजस्वी यादव के साथ नज़र आता था लेकिन चुनाव नतीजे बीजेपी और नीतीश के हित में गए अब उपराष्ट्रपति चुनाव में एन डी ए की जीत को बीजेपी के जरिए भुनाया जाएगा वो साफ़ तौर पर कहेंगे कि इस चुनाव में ना ई वी एम था ना फ़र्ज़ी वोटर फिर भी बीजेपी/ एन डी ए की जीत हुई।

बात दरअसल ये है कि राहुल गांधी जनता को मैनेज करने में लगे हैं और बीजेपी चुनाव को मैनेज करने में दोनों अपनी अपनी जगह कामयाब हैं जनता को प्रभावित करने में राहुल गांधी कामयाब हैं और चुनावों की प्रभावित करने/ जीतने में बीजेपी कामयाब है।

राहुल गांधी को सोचना होगा कि उनके मुद्दे उनकी लोकप्रिय ता चुनाव नतीजों में कैसे बदले। मुझे लगता है वो और उनकी टीम इस दिशा में कुछ ठोस करने में सफल नहीं हो रही है। वो शायद श्रीलंका बंगलादेश और नेपाल जैसे हालात का इंतजार कर रहे हैं। अगर ऐसा है तो उन्होंने ने मान लिया है कि वो न तो चुनावी रणनीति में सफ़ल हैं और ना अपनी चुनावी सफलता को सुनिश्चित मानते हैं सब कुछ उन्होंने जनता पर छोड़ दिया है।

ये राजनीतिक दूरदर्शिता नहीं है उन्हें चुनाव जीतने की रणनीति भी बनानी होगी,,,

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