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“अज्ञात अज्ञानी का दृष्टिकोण: ईश्वर — आस्तिक और नास्तिक के बीच की मूर्खता”

📍मुंबई | विशेष रिपोर्ट — AIMA MEDIA

आध्यात्मिक विचारक अज्ञात अज्ञानी (Agyat Agyani) ने अपने नवीन लेख “ईश्वर — आस्तिक और नास्तिक के बीच की मूर्खता” में कहा कि दोनों ही पक्ष — ईश्वर को मानने वाला और उसे नकारने वाला — एक ही मानसिक जाल में फँसे हैं।

उनके शब्दों में —

> “आस्तिक ने ईश्वर को सिद्ध नहीं किया, बस थोप दिया।
नास्तिक ने उसी थोपे हुए ईश्वर को नकार दिया।
और दोनों भूल गए — देखना।”



अज्ञात अज्ञानी के अनुसार, ईश्वर न तो “है” में है, न “नहीं है” में —
वह उस मौन में है जहाँ दोनों की घोषणाएँ थम जाती हैं।
वे लिखते हैं —

> “जिसने अपनी मानसिकता छोड़ी, वही उसे पा सका।
क्योंकि ईश्वर बाहर नहीं — भीतर की मौन चेतना है।”



उनका यह दृष्टिकोण धार्मिकता और नास्तिकता, दोनों की सीमाएँ उजागर करता है।
वे कहते हैं कि मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह “मानना” और “नकारना” जानता है, पर “देखना” नहीं।
और जब तक देखना नहीं आता, तब तक ईश्वर केवल एक तर्क है — अनुभव नहीं।

लेख का सार यह बताता है कि ईश्वर को सिद्ध करने की नहीं, जीने की आवश्यकता है।
क्योंकि पूरा अस्तित्व पहले से ही ईश्वर से लबालब भरा हुआ है — बस मनुष्य की मानसिकता खाली है।


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✧ Philosophical Note ✧

ईश्वर किसी विश्वास का विषय नहीं,
बल्कि उस मौन की उपस्थिति है
जहाँ विश्वास और अविश्वास दोनों विलीन हो जाते हैं।


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✍🏻🙏🌸 — मनीष कुमार
Message Conduit of “Agyat Agyani Philosophy”
AIMA Media Member | Mumbai

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