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दिल्ली या इंद्रपस्थ क्या कहता है इतिहास?

नई दिल्ली। गत दिवस दिल्ली स्थापना के 74वे वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली चांदनी चौक लोक सभा सीट से सांसद प्रवीण खंडेलवाल जी ने गृहमंत्री से ये मांग रखी की दिल्ली का नाम बदलकर इंद्रपस्थ रखा जाए और एक विशेष स्थान पर पांडवों की प्रतिमा भी लगाई जाए क्योंकि पांडवों ने दिल्ली से राज पाठ संभाला था ।इस पर जानकारी इकठ्ठा करने पर मालूम हुआ की दिल्ली स्थित पुराना किला पांडवों की कर्म भूमि मानी जाती रही है तो मूर्तियों की स्थापना वहां की जा सकती है अब बात आती है दिल्ली का नाम बदलने की तो वर्तमान नाम *दिल्ली" राजा ढिल्लो के नाम पर पड़ा और ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता की पांडवों के समय पूरी दिल्ली का नाम इंद्रपस्थ था ।एक जिला वो भी शायद श्रीनिवासपुरी के आस पास का उसका ही नाम केवल इंद्रपस्थ था ।महाभारत में वर्णन है की भगवान कृष्ण जब संधि के लिए दुर्योधन के पास गए और पांडवों के लिए पांच गांव मांगे गए तो वे पांच गांव थे स्वर्णप्रस्थ (सोनीपत), पर्णप्रस्थ (पानीपत), व्याघ्रप्रस्थ (बागपत) तिलप्रस्थ(तिलपत) और वरूप्रस्थ (वरूपत या बरनामा) तब वे संतुष्ट होंगे और कोई और मांग नहीं रखेंगे ।लेकिन दुर्योधन ने इस मांग को ठुकरा दिया और फिर युद्ध हुआ ।समय काल के साथ दिल्ली में मुगलों ने भी राज किया लेकिन नाम दिल्ली ही रहा ।इंडस सिंधु ऑर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष नितिन कालरा के विचार में पूरी दिल्ली नहीं बल्कि लुटियंस दिल्ली की तर्ज पर दिल्ली के एक क्षेत्र इंद्रपस्थ जोन बना दिया जाएं तो ज्यादा बेहतर होगा बाकी सरकार ,माननीय गृह मंत्री आदरणीय सांसद जी की इस मांग को कितनी गंभीरता से लेते है ये समय तय करेगा।

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