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राजनीति में धर्म कोई वोट बैंक नहीं

✍️— संपादकीय लेख


भारत जैसे विविधताओं से भरे लोकतंत्र में धर्म केवल आस्था का नहीं, बल्कि संस्कृति और मूल्य का प्रतीक है। धर्म ने हमेशा समाज को एक सूत्र में बाँधने का कार्य किया है। परंतु हाल के वर्षों में धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल जिस प्रकार बढ़ा है, वह लोकतंत्र की आत्मा के लिए चिंता का विषय बन गया है।

राजनीति का उद्देश्य समाज का विकास और लोककल्याण होना चाहिए, न कि धार्मिक भावनाओं का दोहन। जब धर्म को वोट बैंक बना दिया जाता है, तो न केवल राजनीति का स्तर गिरता है, बल्कि समाज भी विभाजन की ओर बढ़ने लगता है।
धर्म लोगों को जोड़ने का माध्यम है, उसे बाँटने का औज़ार बनाना हमारे संविधान और सामाजिक सद्भाव — दोनों के साथ अन्याय है।

महात्मा गांधी ने कहा था — “मेरी राजनीति धर्म से प्रेरित है, क्योंकि धर्म मेरे जीवन का आधार है।” लेकिन गांधीजी का धर्म किसी पंथ या मत का नहीं, बल्कि सत्य, अहिंसा और मानवता का धर्म था।
आज की राजनीति को भी उसी दिशा में लौटना होगा — जहाँ धर्म का स्थान नीति-निर्देशक के रूप में हो, न कि चुनावी हथियार के रूप में।

धर्म से प्रेरित राजनीति देश को नैतिकता देती है, लेकिन धर्म पर आधारित राजनीति देश को तोड़ती है।
इसलिए समय की माँग यही है कि राजनीतिक दल धर्म को वोट बैंक बनाने की प्रवृत्ति से ऊपर उठें,
और जनता भी ऐसे नेताओं को चुने जो धर्म के मूल तत्व — करुणा, न्याय और समानता — को अपनाएं, न कि उसके नाम पर सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ें।

> राजनीति में धर्म कोई वोट बैंक नहीं, बल्कि नैतिकता और लोककल्याण का दीपस्तंभ है।
यही सोच हमारे लोकतंत्र को सशक्त और समाज को एकजुट रख सकती है।

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