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"पीएम केयर्स आरटीआई एक्ट 2005 के सेक्शन 2(एच) के तहत पब्लिक अथोरिटी नहीं हैं.सूचना अधिकार कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने कहा.

आर्काइव | 18 जून 2020 को सूचना अधिकार कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने प्रधानमंत्री कार्यालय में एक आरटीआई दायर की जिसमें पीएम केयर्स फंड से जुड़े सभी उपलब्ध दस्तावेजों की कॉपी मांगी गई थी. 26 जून 2020 को आरटीआई के जवाब में प्रधानमंत्री कार्यालय ने लिखा, "पीएम केयर्स आरटीआई एक्ट 2005 के सेक्शन 2(एच) के तहत पब्लिक अथोरिटी नहीं हैं. फिर भी पीएम केयर्स फंड से जुड़ी प्रासंगिक जानकारियां www.pmcares.gov.in पर देखी जा सकती हैं.'' प्रधानमंत्री कार्यालय से मिले इस जवाब ने पीएम केयर्स को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए.

19 जनवरी 2020 को 100 सेवानिवृत नौकरशाहों ने प्रधानमंत्री के नाम एक खुला खत लिखकर पीएम केयर्स फंड में पारदर्शिता की कमी पर अपनी चिंता जाहिर की. खत में लिखा था, “तुरंत यह खत लिखने का कारण 24 दिसंबर 2020 को भारत सरकार द्वारा सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत विवरण को इस आधार पर प्रकट करने से इनकार करना है कि पीएम केयर्स फंड आरटीआई अधिनियम, 2005 के 2(एच) धारा के दायरे में एक सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं है. अगर यह एक सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं है, तो सरकार के सदस्यों के रूप में प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री ने अपने पदनाम और आधिकारिक पदों को कैसे दिया है? वे क्यों अपनी आधिकारिक क्षमता में इसके ट्रस्टी हैं, बतौर नागरिक नहीं?”

2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि ट्रस्ट, सोसाइटी और गैर-सरकारी संगठन चाहे वह सार्वजनिक हो या निजी अगर उन्हें पर्याप्त सरकारी फंडिग होती है तो उन्हें पब्लिक अथोरिटी के तौर पर ही देखा जाना चाहिए. जब पीएसयू और केंद्र सरकार के कर्मचारियों की सैलरी से पैसा पीएम केयर्स फंड में डाला गया, तो इसे पब्लिक अथोरिटी के तौर पर क्यों नहीं देखा जाना चाहिए.

पीएम केयर्स फंड के बनने के अगली ही रोज 28 मार्च 2020 को कारपोरट कार्य मंत्रालय ने एक सर्कुलर जारी किया. मंत्रालय ने साफ तौर पर बताया कि पीएम केयर्स फंड में दिया गया चंदा कंपनी अधिनियम 2013 के सेक्शन 135 के सेड्यूल VII के तहत आने वाले कारपोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी या सीएसआर के तौर पर देखा जाएगा. सर्कुलर में लिखा गया है, "आइटम नंबर. (viii) कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची VII, जो उन गतिविधियों का विश्लेषण करती है जिन्हें कंपनियां अपने सीएसआर दायित्वों के तहत कर सकती हैं, परस्पर इस बात को भी निर्धारित करती है कि सामाजिक-आर्थिक विकास और राहत के लिए केंद्र सरकार द्वारा स्थापित कोई भी कोष सीएसआर की श्रेणी में रखा जाता है. किसी भी प्रकार की आपात स्थिति या संकट की स्थिति में प्रभावित लोगों को राहत देने के लिए पीएम केयर्स फंड की स्थापना की गई है. तदनुसार, यह स्पष्ट किया जाता है कि केयर्स फंड में किया गया कोई भी दान कंपनी अधिनियम 2013 के तहत सीएसआर व्यय के योग्य होगा. इसे सक्षम प्राधिकारी के अनुमोदन से जारी किया जाता है.

कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची VII, आइटम नंबर. (viii) में किस किस्म के दान को सीएसआर व्यय में गिना जाएगा उसका ब्यौरा कुछ इस तरह से है, “अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़ा वर्गों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक विकास और राहत और कल्याण के लिए प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष या केंद्र सरकार द्वारा स्थापित किसी अन्य कोष में योगदान.”

इसमें साफ लिखा था कि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष के अलावा सामाजिक और आर्थिक विकास और एससी/एसटी/ओबीसी/अल्पसंख्यक/महिलाओं के विकास के लिए स्थापित केंद्र सरकार के किसी भी फंड में योगदान सीएसआर के मद में गिना जाएगा. 28 मार्च 2020 को जिस समय कारपोरेट कार्य मंत्रालय ने सर्कुलर जारी करके पीएम केयर्स फंड को सीएसआर के दायरे में लाया, तब यह अनुसूची VII, आइटम नंबर. (viii) की किसी भी शर्त को पूरा नहीं करता था. पीएम केयर्स फंड एक सार्वजनिक ट्रस्ट के तौर पर स्थापित हुआ था. ऐसे में इसमें दिए गए दान को सीएसआर व्यय के तौर पर देखना कितना तार्किक है?

इस विसंगति से बचने के लिए 26 मई 2020 को कारपोरेट कार्य मंत्रालय ने एक नोटिफिकेशन के जरिए कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची VII में बदलाव करके पीएम केयर्स फंड को भी आइटम नंबर. (viii) में जोड़ दिया. यह साफ था कि कारपोरेट कार्य मंत्रालय कानून में मन मुताबिक बदलाव कर रहा था ताकि पीएम केयर्स फंड में सीएसआर के योगदान में कोई कानूनी अड़चन ना आए.

1 मई 2020 को नौजवान वकील सम्यक गंगवाल ने प्रधानमंत्री कार्यालय में पीएम केयर्स फंड की जानकारी मंगाते हुए एक आरटीआई डाली. 2 जून 2020 को उन्हें भी अंजलि भारद्वाज की तरह जवाब मिला कि पीएम केयर्स फंड पब्लिक अथोरिटी नहीं है. इसे चुनौती देते हुए गंगवाल ने दिल्ली उच्च न्यायलय में एक जनहित याचिका दाखिल की. इस केस में उनके वकील देबोप्रियो मौलिक कहते हैं, “प्रधानमंत्री कार्यालय का कहना है कि पीएम केयर्स फंड पब्लिक अथोरिटी नहीं है. लेकिन आप देख लीजिए कि पीएम केयर्स फंड में कार्यालय का पता भी प्रधानमंत्री कार्यालय का दिया हुआ है. पीएम केयर्स फंड की वेबसाईट को .gov डोमेन हासिल है जोकि सरकारी वेबसाईट के लिए ही होता है. पीएम केयर्स फंड अपनी वेबसाईट पर राष्ट्रिय प्रतीक अशोक स्तम्भ का इस्तेमाल करता है. तो क्या आप कह पाएंगे कि सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है? पीएम केयर्स फंड अच्छी मंशा से बना फंड हो सकता है. लेकिन हर नागरिक को जानने का अधिकार है कि इसमें कहां से पैसा आ रहा है और कहां जा रहा है. अगर मंशा अच्छी ही है तो इसे सूचना के अधिकार के दायरे में लाने में क्या हर्ज है?”

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