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एक धर्म विशेष के आड़ में कुर्सी हासिल करना लोकतंत्र की हत्त्या नही तो और क्या है?

हमारा देश हिंदुस्तान 1947 में अंग्रेज़ों से एक लंबी लडाई लड़ने के बाद आज़ाद हुआ, जब आज़ादी का संग्राम चल रहा था तो उस समय हमारे देश का हर एक विक्ति सिर्फ इसी लिए जी रहा था के कब अबग्रेज़ों की गुलामी से आज़ादी मिले, आज़ादी की लडाई में सब सिर्फ भारत्ये बन कर लड़ रहे थे हाँ कुछ लोग उस वक्त भी अंग्रेज़ों की दलाली में लगे थे, लेकिन उस की ज़रूरत यहाँ नही है, हम अपने देश के सभी जाती और धर्म के लोगों एक बात दर्शाना चाहते हैं के आज़ादी के संग्राम में जब हिंदू मुस्लिम, पंडित मुल्ला, चर्च मन्दिर मस्जिद हर जगह के लोग शामिल थे और उन में ज्यादह तर मुस्लिम लोग जो 64894 यह इंडिया गेट पर आज भी मौजोद है, हम किसी भी धर्म के लोगों को इसका एहसास नही दिला रहे हैं की मुस्लिम लोग ज्यादह थे, बल्कि इसका एहसास दिलाना है के आज़ादी के 79 सालों बाद भी हम आप दो कौड़ी के नेता लोगों की खातिर अपने देश को हिंदू मुसलमान में बांट रहे हैं, और जाहिल, गुंडे मवाली लोगों को जिनका समाज की तरक्की और मुल्क की तरक्की से आप की खुशहाली से कुछ लेना देना नही है, किसी भी हाल में ऐसे लोगों को कुर्सी मिल जाने चाहिए, चाहे उनको इसके लिए किसी भी हद को पार करना पड़े, आज यह चलन 2014 के बाद से बढ़ता दिख रहा है, जिस वजह से लोमतंत्र को खतरा तो है ही पर सब से बड़ा नुकसान अपने भारत देश को है, एक आम आदमी कुछ बोलने से घबरा रहा है, युवा लातीयां खा रहा है, किसान खाद और बीज के लिए परेशान् है, महिलाएं अपने अधिकार के लिए परेशान्, और आम जनता हिंदू मुसलमान, मन्दिर मस्जिद में फंसा दिया गया है, मुद्दा गायब है, दलित बस्तियाँ ऊजाडि जा रही हैं, गरीबों के मकान दुकान आतीकरमं की भेंट चढ़ी हुई है, जब ऐसे हालात नुकरशाह देश का बना दें तो इसी को लोकतंत्र की हत्त्या कहा जाता है, आम आदमी के मौलिक अधिकार धर्म और जात पात के नाम देश में अत्पनं किए जाएं तब भी लोनतंत्र की हत्त्या ही कहलाती है..
धन्यवाद..

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