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न कोई रहा है न कोई रहेगा

सभी मानव जानता है,न कोई रहा है न कोई रहेगा।एका एक सभी को जाना है,राजा रंक फकीर को भी। फिर लोग पैसे पैसे की होड़ में मानवीय धर्म को त्याग कर दूसरे को दुख पहुंचाना ही अपने का शान क्यों समझते हैं । वे वहीं लोग करते हैं जो समझते हैं कि भगवान काल्पनिक है। जब तक जिन्दा हैं ऐश आराम से ज़िन्दगी जी लेना ही स्वर्ग है। मरने के वाद की स्थिति को देखा किसने हैं। करोना के समय में सभी धार्मिक स्थल पर ताला लगा दिया गया था। इष्ट देव की पूजा पाठ सभी मजहब में बंद हो गया था। फिर प्रलय क्यों नहीं हुआ। आज भी ईमानदार लोग दुखी और बेइंसाफी बेइमान लोग सुखी क्यों है। चर्बाक की नीति चरितार्थ होता दिखाई दे रहा है। खुबी और खामियां हर जगह है। हंस दूध से पानी विलग कर पीता है। वैसे ही जिस धर्म ग्रंथों में खुबियां है उसे तो अपनाओ। तुलसी दास जी लिखें हैं।
दया धर्म का मूल है,पाप मूल अभियान।
तुलसी दया न छोरियों,जब लगी घट में प्राण।।
धर्म-कर्म न जानते हों लेकिन बचपन से गुरुजी द्वारा समझाया गया है कि, सदा सत्य बोलो, सभी जीव पर दया करो, झूठ मत बोलो, सभी धर्मों को आदर करो, दूसरे की सम्पत्ति को मिट्टी के ढेला समान समझो, माता-पिता के पैर के नीचे जन्नत समझो, जिसका मिशाल श्रवण कुमार जी है। पति को देवता मानो, जिसका उदाहरण माता अनसूइया हैं। अपने उम्र के हर स्त्री को पत्नी के अलावा बहन, माता उम्रदराज महिला को मां, बेटी उम्र लड़की को बेटी तुल्य समझो। इस बात पर हर इंसान को तो अमल करना चाहिए। धर्मशास्त्र में भी बलात्कारी देवताओं की चर्चा है। ब्रह्मा विष्णु महेश का शर्त माता अनसूइया के समक्ष सर्वविदित है। मेघनाद की पत्नी का सतित्व भंग की कहानी भी किसी से छिपी नहीं है। अहिल्याबाई का बलातकार इंद्रदेब स्वर्ग देवता से ।सोचो किसके आचरण को अनुकरण किया जाय। इसी दुविधा के कारण मानव दानव प्रवृत्ति का होते जाते है। आज पढ़ें लिखे लोग ही माता पिता को वृद्धावस्था में अनाथालय में शरण दिलाता है।अपनी पत्नी के अलावा दूसरे पर निशाना साधते हैं। यहां भगवान राम का आचरण को क्यों नहीं अपनाते हैं। मानव मानव से जो धर्म घृणा करना सिखाया अब तो संविधान युग में, भाईचारा और समानता का अधिकार क्यों छिनना चाहते हैं। मानवोचित गुणवत्ता जिसमें हो यथा दया सभी जीव पर करना, अपनी वाणी, व्यवहार एवं विचार से किसी को कष्ट नहीं पहूंचाया ही सर्वोपरि धर्म है। तथागत बुद्ध ने कहा था एक पत्ता को जब तोड़ने के बाद जोड़ नहीं सकते, तो तोड़ने का अधिकार किसने दिया। सभी जीवों पर दया करो। लेकिन पढ़ें लिखे मानव तो मानव पर भी दया नहीं करता। जो दीन दुखी मेहनत कर अपनी सरकार की जमीन में अज्ञानताबश घर बना लिया, नहीं बनाना चाहिए। लेकिन सत्ताधारी जो उच्चाशीन पद पर ज्ञानी पुरुष दया विहीन होकरउसे बेघर कर दिया। फिर अज्ञानी और ज्ञानी में अंतर क्या रह गया। कहा जाता है दीन दुखियों की आह भगवान की आह है।क्या धार्मिक लोग को इसका भय नहीं है। भू-माफियाओं के साथ सामंतवादी भूमालिको के साथ यदि होता है तो अलग-अलग बातें हैं। कितना लिखा जाय अंत में , तिनका कबहुंक नीन्दीय, जो पयन तर होई। कबहुं उड़ कठिन परे,पीड़ घनेरो होई। साईं इतना दीजिए,जमैइ कुटुम्ब समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय। फिर इतनी सम्पत्ति क्यों। सम्राट अशोक और तथागत बुद्ध से कुछ सीखें। खून-खराबा के बाद जागृति आने पर राज पाट छोड़ दिया। आज धन के लालच में धनी रहने के बाद भी धन के लालच में सत्तासीन होना चाहता है,नकी देश कल्याण के लिए।
जागेश्वर मोची मधुबनी संवाददाता।

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