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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सुलह नहीं तो तलाक तुरंत मंज़ूर, 6 माह का इंतज़ार जरूरी नहीं


नई दिल्ली: विवाह को बचाने की कोशिश सफल न होने की स्थिति में अब पति-पत्नी को 6 महीने के अनिवार्य इंतज़ार की बाध्यता नहीं झेलनी होगी। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सोमवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि दंपति के बीच सुलह की कोई संभावना नहीं बची, तो अदालत तुरंत तलाक मंज़ूर कर सकती है।

पीठ ने अपने आदेश में कहा कि शादी टूटने के बाद दंपति को अनावश्यक प्रतीक्षा अवधि में बांधे रखना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेषाधिकारों का उपयोग कर दोनों पक्षों को तुरंत राहत दे सकती है। अदालत का मानना है कि जब संबंध पूरी तरह समाप्त हो चुके हों, तब जबरन साथ रहने का दबाव किसी के हित में नहीं होता।

क्यों लिया गया यह फैसला?

कई मामलों में देखा गया कि पति-पत्नी आपसी सहमति से तलाक चाहते हैं, मगर कानून में मौजूद 6 माह की प्रतीक्षा अवधि उनके लिए मानसिक और सामाजिक तनाव का कारण बनती है। 2016 और 2022 में आए मामलों में भी इसी प्रकार की समस्या सामने आई थी, जिसके बाद यह मुद्दा संविधान पीठ के पास भेजा गया।

क्या कहा अदालत ने?

यदि विवाह को बचाने के प्रयास पूरी तरह विफल हो चुके हों,

दंपति अलग-अलग जीवन जी रहे हों,

और सुलह की कोई संभावना न हो,


तो अदालत प्रतीक्षा अवधि हटाकर तलाक का आदेश दे सकती है।

फैसले का प्रभाव

यह फैसला उन दंपतियों के लिए राहत लेकर आया है जो लंबे समय से न्यायालयों के चक्कर लगा रहे थे और जिनके बीच संबंध सुधार की कोई संभावना नहीं रह गई थी। अब ऐसे मामलों में तेज़ और मानवीय समाधान उपलब्ध होगा।

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