logo

रकरिया में गलत इलाज से 57 वर्षीय ग्रामीण की मौत — सिस्टम सोता रहा और क्लिनिक बेखौफ़ चलता रहा

डिंडोरी -- आदिवासी अंचल डिंडोरी में अवैध डिस्पेंसरियों का जाल इस कदर फैल चुका है कि स्वास्थ्य विभाग की नींद उड़नी चाहिए — लेकिन यहां तो मानो पूरा सिस्टम ही गहरी नींद में है। भोपाल से हर साल निर्देश जारी होते हैं कि जिलों में वैध-अवैध क्लिनिकों की सूची बनाकर कार्रवाई करें, लेकिन डिंडोरी में ये आदेश फ़ाइलों की धूल झाड़ने से आगे नहीं बढ़ते। नतीजा—गांव-गांव में खड़े हो चुके हैं बिना योग्यता वाले डॉक्टरों के अड्डे, और कीमत चुका रही है जिले की भोली-भाली व मासूम अवाम।

12 घंटे में सब खत्म --यह लापरवाही कोई मामूली बात नहीं।जिला मुख्यालय से महज 15–16 किलोमीटर दूर रकरिया गांव के 57 वर्षीय चंद्रसिंह की जान एक निजी “क्लिनिक” में गलत इलाज के चलते चली गई।परिवार की कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है।पत्नी गनपति बाई के मुताबिक—23 अक्टूबर को दोपहर 12 बजे सिर दर्द की शिकायत पर पति को शाहपुर के एक निजी क्लिनिक ले गईं। वहां बिना जांच-पड़ताल के एक के बाद एक चार बोतलें चढ़ा दी गईं और दवाएँ थमा दी गईं। इलाज क्या हुआ—उल्टा हालत और बिगड़ गई। उल्टियाँ होने लगीं, और घर लाते-लाते 12 घंटे में चंद्रसिंह ने दम तोड़ दिया।

बस 10 हजार का ‘समझौता’? -- सबसे चौंकाने वाली बात—परिजनों ने अभी तक कोई शिकायत नहीं की है।लेकिन खबरें फैलते ही कुछ मीडियाकर्मी पहुंचते हैं और 10 हजार रुपए देकर लौट जाते हैं! परिजन खुद कहते हैं—“ये पैसा डॉक्टर ने मीडिया वालों को दिया था… उन्होंने हमें पकड़ा दिया। लेकिन क्यों दिया—समझ नहीं आया।”अब बड़ा सवाल—जब मीडिया को पूरा मामला पता था, तो फिर खबर क्यों नहीं बनी? 10 हजार की यह रकम “मदद” थी या “मुँह बंद रखने का सौदा”?गाँव में लोग दबी आवाज़ में पूछ रहे हैं—क्या मौत की कीमत बस इतनी थी?

न बोर्ड, न रजिस्ट्रेशन, न डिग्री -- हमारे प्रतिनिधि की जाँच जब आगे बढ़ी तो तस्वीर और चौंकाने वाली सामने आई।टीम जब शाहपुर स्थित उस कथित “क्लिनिक” पहुँची तो—क्लिनिक पूरे ठाठ से चालू,मरीज भले न हों, पर डॉक्टर साहब की बैठक चमचमाती हुई ,अंदर बाकायदा बेड लगे हुए , दवाइयों और उपकरणों का पूरा इंतज़ाम।लेकिन…न कोई रजिस्ट्रेशन का सर्टिफिकेट , ना डॉक्टर की डिग्री का एक कागज़ और ना ही क्लिनिक का कोई बोर्ड।और जब डॉक्टर से बोर्ड के बारे में पूछा गया तो डॉक्टर का जवाब सुनिए—“बोर्ड हवा में उड़ गया।”यानी जानें जाएँ, क्लिनिक चलें, और कार्रवाई हवा में उड़ जाए—बस बोर्ड ही नहीं, पूरा सिस्टम हवा में उड़ चुका है।

बहरहाल क्लिनिक अब भी बेखौफ चल रहा है।मीडिया भी खामोश है।परिजन असमंजस में हैं।और स्वास्थ्य विभाग—कहाँ है ?क्या अब भी कोई इंतज़ार है ? या फिर कोई और जान जाने के बाद प्रशासन जागेगा?

इनका कहना है --

उक्त डिस्पेंशरी की जानकारी जैसे ही हमारे संज्ञान मे आई, हमने टीम क़ो फ़ौरन मौक़े पर रवाना किया, लेकिन संचालक डिस्पेंसरी और मेडिकल स्टोर दोनों बंद करके चले गये थे। मामले की गंभीरता क़ो देखते हुये आगे कार्यवाही की जायेगी। और हमारा पूरा प्रयास होगा की अवैध डिस्पेंशरियों पर यह कार्यवाही सतत जारी रहे।

डॉ मनोज पांडे ( मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ अधिकारी, डिंडोरी )




124
3566 views