कुंडलिया
कुंडलिया
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सृजन शब्द-सरिता
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1-
सरिता-जैसी बह रही,
अविरल जीवन-धार।
बीच-धार में कर रहे,
प्राणी सोच-विचार।।
प्राणी सोच-विचार,
ठिकाना कैसे-पायें।
नहीं-नीर का अंत,
बीच में गोता-खायें।।
प्रभुपग होते-पार,
जिन्हें-करती है तरिता।
करती-है उद्धार,
निरंतर सुरसरि-सरिता।।
2-
सरिता-बहती वेग से,
तैर-रही है मीन।
लाल-नदी का नीर है,
पानी है-नमकीन।।
पानी है-नमकीन,
रात है सबसे-काली।
बाँझ-नार का पूत,
चाँद-लख ठोके-ताली।।
देखो-प्रभुपग दीन,
सजी दुल्हिन-सी धरिता।
बहती है अविराम,
राम-की निर्मल सरिता।।
3-
सरिता-बहती भाव की,
मन है भाव-विभोर।
नाच-रहे हैं घाट पर,
छम-छम जुगल किशोर।।
छम-छम जुगल किशोर,
राधिका गाना-गाती।
त्याग-सैकड़ों देह,
साथ-मोहन का पाती।।
प्रभुपग मत कर-शोर,
धार-यमुना की तरिता।
बहती-बारंबार,
छंद की पावन-सरिता।।
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प्रभुपग धूल