
सच्चाई की आवाज दबाने के उद्देश्य से पत्रकार पर जिंदल हॉस्पिटल संचालक का हमला
सिवनी (मध्य प्रदेश)
आज के दौर में पत्रकारिता किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं रह गई है। सच दिखाने और जनहित की आवाज उठाने वाला पत्रकार जब ईमानदारी के रास्ते पर चलता है तो वह समाज का नायक कहलाता है, लेकिन जैसे ही वह अपने परिवार, रोज़गार और सुरक्षा की चिंता करता है, उसी समाज की उपेक्षा और आरोपों का शिकार बन जाता है। बिना वेतन, कड़ी धूप, मूसलाधार बारिश और कड़ाके की ठंड में दिन-रात सच सामने लाने वाला पत्रकार आज खुद असुरक्षित महसूस कर रहा है। क्या उसे सम्मानपूर्वक जीने और सहयोग पाने का अधिकार नहीं है? यही यक्ष प्रश्न आज सिवनी के गलियारों में गूंज रहा है।
जानिए क्या है पूरा मामला
प्राप्त जानकारी के अनुसार 28 दिसंबर 2025 की सुबह लगभग 9 बजे शहर के भैरोगंज दलसागर के किनारे स्थित जिंदल हॉस्पिटल में इलाज के दौरान एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई। इसके बाद अस्पताल प्रबंधन और मृतक के परिजनों के बीच शव सौंपने को लेकर विवाद की स्थिति बन गई।
सूचना मिलने पर अपने पत्रकारिता धर्म का निर्वहन करते हुए साप्ताहिक संवाददूत समाचार पत्र एवं संवाददूत न्यूज़ के प्रधान संपादक सतीश कुमार मिश्रा मौके पर कवरेज के लिए पहुंचे। वे पीड़ित परिजनों का पक्ष जानकर कैमरे में रिकॉर्ड कर रहे थे, तभी अस्पताल के संचालक डॉ. सुनील अग्रवाल बाहर आए और आपा खो बैठे। आरोप है कि उन्होंने स्वयं को अस्पताल का मालिक और अध्यक्ष बताते हुए पीड़ित परिजनों पर चिल्लाना शुरू किया और पत्रकार पर झल्लाते हुए शराब पीकर ब्लैकमेल करने जैसे गंभीर आरोप लगाए।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार इसी दौरान डॉ. अग्रवाल ने पत्रकार सतीश मिश्रा का गला दबाकर दीवार पर पटक दिया और अपने स्टाफ के साथ मिलकर लात-घूंसों से मारपीट की। इतना ही नहीं, लोकतंत्र की आवाज कहे जाने वाले मीडिया उपकरण—माइक आईडी और कैमरे का ट्राइपॉड—भी तोड़कर फेंक दिया गया।
मारपीट से ज्यादा दर्दनाक था मानसिक आघात
घटना के बाद जब अनुभवी पत्रकार सतीश कुमार मिश्रा कोतवाली पहुंचे तो उनकी आंखें नम थीं। ये आंसू शारीरिक चोट के नहीं, बल्कि निष्पक्ष पत्रकारिता की कीमत चुकाने के मानसिक आघात के थे। यह सच्चाई है कि रसूखदारों के खिलाफ खड़े होने में आर्थिक और सामाजिक जोखिम उठाने पड़ते हैं। सतीश मिश्रा का दर्द केवल उनका व्यक्तिगत दर्द नहीं, बल्कि हर उस पत्रकार का दर्द है जो सच के लिए संघर्ष कर रहा है।
जिंदल हॉस्पिटल पर पहले भी उठते रहे हैं सवाल
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार जिंदल हॉस्पिटल का विवादों से पुराना नाता रहा है। आरोप है कि विवाद की स्थिति में यहां अक्सर सीसीटीवी कैमरे बंद पाए जाते हैं या बंद कर दिए जाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां सेवा से ज्यादा व्यवसायिकता को प्राथमिकता दी जाती है। इलाज के दौरान मृत्यु होने पर संवेदनशीलता दिखाने के बजाय बकाया राशि वसूलने के लिए शव तक रोकने से भी परहेज नहीं किया जाता। प्रबंधन का अड़ियल और गैर-जिम्मेदाराना रवैया कई बार सुर्खियों में रहा है।
पत्रकारों ने की सख्त कार्रवाई की मांग
घटना के बाद पत्रकारों के एक प्रतिनिधिमंडल ने पुलिस अधीक्षक से मुलाकात कर शिकायत दर्ज कराई और मांग की कि तत्काल एफआईआर दर्ज कर जिंदल हॉस्पिटल के संचालक डॉ. सुनील अग्रवाल की शीघ्र गिरफ्तारी की जाए तथा मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो।
कोतवाली थाना प्रभारी द्वारा बयान दर्ज किए जाने के बाद पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए डॉ. सुनील अग्रवाल के खिलाफ बीएनएस की धारा 296(बी), 115(2), 351(2), 324(4) एवं 3(5) के तहत प्रकरण दर्ज कर लिया है।
बॉक्स में लगाएं
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता आज खुद को असुरक्षित और अकेला महसूस कर रही है। समाज का हर वर्ग न्याय की उम्मीद लेकर पत्रकार की ओर देखता है, लेकिन आज वही पत्रकार अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को मजबूर है। संवाददूत के प्रधान संपादक सतीश मिश्रा के साथ हुई यह घटना केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि निष्पक्ष पत्रकारिता, उसकी गरिमा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार है।
— सिवनी, मध्य प्रदेश