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बिलासपुर में अपराध बेलगाम, कानून व्यवस्था बेहाल—पुलिस की “कामयाबी” पर उठते सवाल


छत्तीसगढ़ के न्यायधानी बिलासपुर में अपराधियों के हौसले इस कदर बुलंद हो चुके हैं कि आम जनता दहशत के साये में जीने को मजबूर है। शहर की गलियों से लेकर मुख्य सड़कों तक चाकूबाजी, लूट, झपटमारी, मारपीट और खुलेआम गुंडागर्दी की घटनाएं रोज़मर्रा की बात बन चुकी हैं। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि लोग दिनदहाड़े घर से निकलने में भी डर महसूस कर रहे हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि हर घटना के बाद पुलिस अपनी “कामयाबी” के दावे तो करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट नजर आती है। अपराध रुकने के बजाय लगातार बढ़ते जा रहे हैं। चाकूबाजी की घटनाओं में युवक गंभीर रूप से घायल हो रहे हैं, लूटपाट में मेहनतकश लोगों की गाढ़ी कमाई पल भर में लुट जा रही है, और असामाजिक तत्व खुलेआम कानून को चुनौती दे रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कानून व्यवस्था पूरी तरह ढह चुकी है। पुलिस पेट्रोलिंग सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है, जबकि अपराधी बेखौफ होकर वारदात को अंजाम दे रहे हैं। कई इलाकों में तो शाम ढलते ही सन्नाटा पसर जाता है, मानो शहर पर अपराधियों का राज हो।
महिलाएं, बुजुर्ग और छात्र सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। आए दिन मोबाइल छीनने, चाकू दिखाकर लूटने और मारपीट की खबरें सामने आ रही हैं, लेकिन सख्त कार्रवाई के अभाव में अपराधियों के हौसले और बढ़ते जा रहे हैं।
अब सवाल यह है कि बिलासपुर की कानून व्यवस्था आखिर किसके भरोसे है? क्या पुलिस की जिम्मेदारी सिर्फ प्रेस नोट जारी कर “कामयाबी” गिनाने तक सीमित रह गई है? या फिर आम जनता की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम भी उठाए जाएंगे?
शहरवासियों की मांग है कि अपराध पर तुरंत और सख्त नियंत्रण हो, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए और पुलिस व्यवस्था को ज़मीनी स्तर पर मजबूत किया जाए। वरना अगर यही हाल रहा, तो बिलासपुर की पहचान एक सुरक्षित शहर नहीं बल्कि अपराध के गढ़ के रूप में होने लगेगी।

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