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KOTA: चंबल नदी दिल है तो घड़ियाल इसकी धड़कन

कोटा। चंबल सिर्फ एक नदी नहीं, यह उत्तर भारत की जैविक आत्मा है। अगर चंबल नदी इस क्षेत्र का दिल है, तो उसमें बसने वाला घड़ियाल उसकी धड़कन है। यही धड़कन दशकों पहले थमने के कगार पर थी, जब अवैध शिकार, अंधाधुंध दोहन और मानवीय उपेक्षा ने इस विलुप्तप्राय जीव को लगभग खत्म कर दिया था। इसी संकट के बीच वर्ष 1979 में नेशनल चंबल घड़ियाल सेंचुरी की स्थापना हुई। यह फैसला केवल एक अधिसूचना नहीं, बल्कि प्रकृति को बचाने का राष्ट्रीय संकल्प था। राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में फैली यह सेंचुरी आज घड़ियाल, गंगा डॉल्फिन, दुर्लभ कछुओं और सैकड़ों पक्षी प्रजातियों के संरक्षण का सफल अंतरराष्ट्रीय मॉडल मानी जाती है। चंबल नदी देश की सबसे स्वच्छ नदियों में गिनी जाती है और इसका इकोसिस्टम राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है।

- आमजन पर भारी पड़े नियम, राजनीतिक समन्वय से निकला रास्ता :

समय के साथ संरक्षण की यह मजबूत नीति कोटा जैसे शहरी क्षेत्रों में आमजन के लिए चुनौती भी बन गई। सेंचुरी की अधिसूचना में शिवपुरा, किशोरपुरा जैसे प्राचीन और आबादी वाले इलाके आ गए, जहां पीढ़ियों से बसे हजारों परिवार पट्टों, निर्माण और मरम्मत जैसे बुनियादी अधिकारों से वंचित हो गए। दशकों तक यह प्रतिबंध लोगों के लिए परेशानी का कारण बना और समाधान की मांग लगातार मजबूत होती गई। इस जनसमस्या पर राजनीति ने संतुलित भूमिका निभाई। कांग्रेस नेताओं ने इसे राज्य स्तर पर गंभीरता से उठाया, वहीं भाजपा के जनप्रतिनिधियों ने इसे केंद्र सरकार तक प्रभावी ढंग से पहुंचाया। स्थानीय जनप्रतिनिधियों, प्रशासन और केंद्र सरकार के समन्वय से अंततः समाधान निकला। वर्ष 2025 में सीमा परिवर्तन का प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया, राज्यपाल की मंजूरी 23 दिसंबर 2025 को मिली और 3 जनवरी 2026 को अधिसूचना जारी कर कोटा क्षेत्र की लगभग 732 हेक्टेयर भूमि को नेशनल चंबल घड़ियाल सेंचुरी के प्रतिबंधित दायरे से मुक्त कर दिया गया।‌ यह फैसला सेंचुरी को समाप्त करने का नहीं, बल्कि सीमा के तार्किक पुनर्निर्धारण का है। इस पर लोकसभा अध्यक्ष और कोटा बूंदी सांसद ओम बिरला द्वारा केंद्रीय स्तर पर रखा प्रस्ताव सफल साबित हुआ।

- जीव को संरक्षण मिला आमजन राहत, 40 हजार परिवारों को सीधा लाभ :

घड़ियाल सेंचुरी से बहाल हुए 40 हजार से अधिक परिवारों में खुशी की लहर है। लगभग 40 वर्षों पुराने प्रतिबंध को पिछले 4 वर्षों के निरंतर प्रयासों से हटाया जाना यह साबित करता है कि अब आमजन के वर्षों से अटके आवासीय पट्टे मिल सकेंगे, वैध निर्माण और मरम्मत संभव होगी, संपत्ति लेन-देन आसान बनेगा और सड़क, सीवरेज व बुनियादी सुविधाओं जैसे विकास कार्य गति पकड़ेंगे। आम नागरिक अनावश्यक कानूनी जटिलताओं से मुक्त होगा और शहरी विकास को नई दिशा मिलेगी। पर्यावरण विशेषज्ञों और संरक्षण प्रेमियों ने इस फैसले का संतुलित स्वागत किया है। उनका कहना है कि राहत के साथ जिम्मेदारी जरूरी है। नदी प्रदूषण, अवैध खनन और अतिक्रमण पर सख्ती बनी रहनी चाहिए, ताकि घड़ियाल, डॉल्फिन और अन्य जलीय जीवों का भविष्य सुरक्षित रहे। आज चंबल नदी भी सुरक्षित है, घड़ियाल की धड़कन भी कायम है और उसके किनारे रहने वाला आमजन भी राहत और उम्मीद के साथ भविष्य की ओर देख रहा है।

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