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अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर प्रधानमंत्री को लिखा पत्र ।

सरकार अराबली पर्वतमाला को मूल रूप में संरक्षित रखने एवं 100 मीटर वाली नई परिभाषा को वापस ले।

रामपुर। शुक्रवार को भारतीय पटेल महासभा, इकाई रामपुर ने प्रधानमंत्री को उपजिलाधिकारी मिलक के माध्यम से एक पत्र सौंपा जिसमें लिखा कि अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन एवं महत्वपूर्ण भू-आकृतिक संरचना है, जिसकी लंबाई लगभग 700–800 किलोमीटर तक गुजरात, राजस्थान, हरियाणा होते हुए दिल्ली तक फैली हुई है। यह न केवल उत्तरी भारत की पर्यावरणीय रीढ़ है, बल्कि देश के जलवायु संतुलन, भूजल भरण, हरियाली, जैव-विविधता और प्रदूषण नियंत्रण की आधारशिला भी है।

हाल ही में सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों में केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊँचाई वाले पहाड़ी भागों को ही ‘अरावली’ का दर्जा देना और इससे कम ऊँचाई वाले हिस्सों को अरावली रेंज से बाहर करना अत्यंत चिंताजनक है।

विशेषज्ञों के अनुसार इस परिभाषा के कारण 80–90% अरावली क्षेत्र कानूनी संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकता है, जिससे—
● पर्यावरणीय संतुलन गम्भीर रूप से बिगड़ जाएगा,
● भूजल recharge प्रणाली कमजोर पड़ेगी,
● दिल्ली-NCR तथा उत्तर भारत में धूल, प्रदूषण और गर्मी की समस्या अत्यधिक बढ़ जाएगी,और
● सबसे गंभीर बात यह कि थार रेगिस्तान जो पूर्व की ओर तेजी से फैलने में सक्षम है, जिसे रोकने में अरावली प्राकृतिक अवरोध का कार्य करती है। वह नष्ट होने लगेगा ।

अरावली केवल पहाड़ नहीं, बल्कि भारत की ग्रीन वॉल (Green Wall) है, जो गर्म हवाओं, धूल के तूफानों और रेगिस्तानीकरण को रोकती है तथा मानसून की नमी व जलवायु को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसकी किसी भी प्रकार की कटौती या परिभाषा में कमी—भविष्य में भीषण पर्यावरणीय संकट का कारण बन सकती है।
◆अरावली पर्वतमाला की मूल, भू-वैज्ञानिक परिभाषा को यथावत रखा जाए।
◆100 मीटर ऊँचाई वाली नई परिभाषा को निरस्त किया जाए, क्योंकि इससे अरावली क्षेत्र का अधिकांश भाग संरक्षण से बाहर हो जाएगा।
◆संपूर्ण अरावली रेंज को एक इकाई मानकर वैज्ञानिक आधार पर दीर्घकालिक संरक्षण नीति बनाई जाए।
◆किन्हीं भी प्रकार की नई खनन लीज़, निर्माण या वनों की कटाई पर पूर्ण रोक सुनिश्चित की जाए।
◆अरावली को “राष्ट्रीय पर्यावरणीय संरक्षित क्षेत्र” घोषित करने पर विचार किया जाए।
अरावली का संरक्षण केवल राजस्थान या हरियाणा का विषय नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत और आगामी पीढ़ियों के अस्तित्व से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा है। अरावली की नई परिभाषा को लेकर केवल राजस्थान व गुजरात मे ही नही अपितु सम्पूर्ण भारत के जनमानस, खासकर युवा पीढ़ी में अत्यधिक रोष व चिंता व्याप्त है । आधुनिक विकास की कोई भी नींव पर्यावरण को नुकसान पहुँचाकर कभी सुरक्षित नहीं बन सकती।

हम आशा करते हैं कि प्रधानमंत्री महोदय इस गंभीर पर्यावरणीय संकट को दूरदर्शिता से देखते हुए अरावली को उसके मूल रूप में संरक्षित रखने हेतु आवश्यक निर्णय अवश्य लेंगे।
आपके हस्तक्षेप से ही आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित पर्यावरण मिल सकेगा।
ज्ञापन के समय प्रदेश अध्यक्ष अनुपम कुमार पटेल,जिला अध्यक्ष डाक्टर नंदन प्रसाद पटेल,कोषाध्यक्ष सत्य प्रकाश ,जिला सचिव दिग्पाल गंगवार,ब्लॉक अध्यक्ष अरविंद कुमार ब्लॉक महासचिव चूड़ामणि,सहदेव गंगवार,भानु प्रताप सिंह ,सुनील कुमार रामप्रकाश,अनिल कुमार, सौरभ गंगवार, बादाम सिंह आदि उपस्थित रहे।

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