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बस्तर: नक्सलवाद के साए से विकास की ओर, अब बड़ी कंपनियों की नज़र बस्तर पर

लबस्तर के जिलों में अब शायद ही कोई नक्सली बचा हो जो सरकार की कार्रवाई के दायरे से बाहर हो। लगातार चल रहे सुरक्षा अभियानों, बड़े पैमाने पर हुए आत्मसमर्पण और विभिन्न विकास योजनाओं के प्रभाव से अब गांव-गांव में बदलाव साफ़ दिखाई देने लगा है। वह बस्तर, जो कभी हिंसा और भय का प्रतीक माना जाता था, अब धीरे-धीरे विकास और विश्वास की राह पर आगे बढ़ रहा है।
सरकार की पकड़ अब बस्तर के दूरस्थ और दुर्गम इलाकों तक मजबूत हो चुकी है। नक्सलवाद अपने अंतिम चरण में प्रतीत हो रहा है, जहां विकल्प केवल दो ही बचे हैं—आत्मसमर्पण या कार्रवाई। इसके साथ ही सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और प्रशासनिक पहुंच जैसी बुनियादी सुविधाओं ने ग्रामीण जीवन की दिशा बदलनी शुरू कर दी है।
इसी बदलते माहौल के बीच अब बड़ी कंपनियों की नज़र भी बस्तर पर टिकी हुई है। खनिज संपदा, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध यह क्षेत्र विकास के नए केंद्र के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि नक्सली प्रभाव कमजोर पड़ा है, लेकिन असली चुनौती अब सुरक्षा नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और समावेशी विकास है। यह बेहद ज़रूरी है कि विकास का वास्तविक लाभ आदिवासी समाज तक पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ पहुंचे। यदि जल, जंगल, ज़मीन और खनिज संसाधनों पर केवल सत्ता और बड़ी कंपनियों का वर्चस्व रहा, तो भविष्य में असंतोष दोबारा पनप सकता है।
बस्तर आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है—जहां शांति को स्थायी बनाने के लिए भरोसे, जनभागीदारी और स्थानीय हितों को विकास की धुरी बनाना होगा।

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