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लोकतंत्र आखरी सांस ले रही है – समय है एकजुट होकर इसे बचाने की–?

पिछले एक साल में सत्ता के गलियारों से बार-बार एक ही अहंकारी उद्घोष सुनाई दिया हैँ —
“अब अगले 20–30 साल हम ही राज करेंगे। विपक्ष सरकार बनाने का सपना देखना छोड़ दे।”
यह कोई आत्मविश्वास नहीं हैँ।यह लोकतंत्र के ताबूत पर खड़ा होकर दिया गया ऐलान हैँ ।
यह दुस्साहस यूँ ही पैदा नहीं हुआ।
यह उस खतरनाक मॉडल की देन है, जिसे सिस्टम के भीतर बैठकर, चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की छाया में, बड़े ही सधे हुए तरीके से तैयार किया गया हैँ।
लोकतंत्र आखरी सांस ले रही है – समय है एकजुट होकर इसे बचाने की अगर अभी आवाज नहीं उठाए तो कभी बोल नहीं पाएंगे क्योंकि बोलने की आजादी ही छीन जाएगी।
भारत अब चुनावी लोकतंत्र नहीं रहा ।
भारत तेज़ी से “Electoral Autocracy” की तरफ धकेला जा चुका है।
आज भारत का नाम उन्हीं देशों की पंक्ति में लिया जाने लगा है जहां चुनाव होते हैँ,वोट डाले जाते हैँ,
लेकिन सत्ता कभी नहीं बदलती।रूस, चीन, बेलारूस, ईरान, मिस्र, वेनेजुएला, जिम्बावे
इन सभी देशों में मतदान एक रस्म है, और लोकतंत्र एक मज़ाक।
V-Dem Democracy Index जैसे अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में भारत को पहले ही “Electoral Autocracy” की श्रेणी में रखा जा चुका हैँ।
Freedom House लगातार भारत की लोकतांत्रिक रैंकिंग घटा रहा हैँ।यह कोई विपक्षी बयान नहीं, यह दुनिया के लोकतांत्रिक पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट हैँ। 2023: जब चुनाव आयुक्त को संविधान से ऊपर बैठा दिया गया
2023 में संसद के भीतर जो कानून लाया गया उसका उद्देश्य सुधार नहीं था,उसका उद्देश्य चुनाव आयोग को सत्ता का आज्ञाकारी औजार बनाना था ।जिस संस्था को संविधान ने निष्पक्ष रेफरी बनाया था,उसे सत्ता ने टीम का खिलाड़ी बना दिया।
यह वही समय था जब “400 पार” का नारा उछाला गया।लेकिन 2024 में जब षड्यंत्र का इस्तेमाल सीमित स्तर पर हुआ तो नतीजा यह रहा कि सत्ता 240 पर एड़ियां रगड़ती रह गई।यहीं से असली घबराहट शुरू हुई।इसके बाद शुरू हुआ “वोट डकैती 2.0”उसके बाद पाँच राज्यों के चुनाव
–अलग-अलग पैटर्न–
–अलग-अलग फ़ॉर्मूले–
–लेकिन एक ही परिणाम–
ऐसे राज्य जहाँ सरकार बनना गणितीय रूप से लगभग असंभव था वहाँ सत्ता अचानक संभव हो गई।क्या यह चमत्कार था ...नहीं....यह वोट डकैती मैनेजमेंट था।अब मैदान में उतारा गया हैँ SIR..SIR कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं हैँ।SIR वह जिन्न है जो वोटर लिस्ट से नाम उड़ाएगा,
मतदाताओं को “संदिग्ध” बनाएगा,और जीत को 80 प्रतिशत तक गारंटीड करेगा। यह प्रक्रिया असंवैधानिक हैँ,अपारदर्शी हैँ,और पूरी तरह सत्ता-पक्षीय हैँ।बाकी पुराने हथियार तो रहेंगे ही EVM पर सवाल काउंटिंग में हेराफेरी फर्जी वोट बोगस मतदान वोट बढ़ाना, वोट घटाना लेकिन SIR इन सबका मास्टर की हैँ जो अगले 20–25 साल तक सत्ता का ताला खोलती रहेगी।
अब विपक्ष का काम—चुनाव लड़ना हारना और अगले चुनाव की तैयारी करना
भर रह गया हैँ।चुनाव आयोग अब संविधान का रक्षक नहीँ,बल्कि सत्ताधारी दल का टूल बन चुका हैँ।जब विपक्ष कमजोर किया जाता हैँ तो दरअसल जनता को कमजोर किया जाता हैँ।जब जनता की आवाज सत्ता के कानों तक नहीं पहुंचती तो फिर महंगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य सब गैरज़रूरी मुद्दे बन जाते हैँ।
यही वजह है कि जनता की पीड़ा पर सत्ता को कोई फर्क नहीं पड़ता सवाल पूछना “राष्ट्रद्रोह” बन जाता हैँ और चुप रहना “देशभक्ति” जागिए ! क्योंकि यह सिर्फ विपक्ष की लड़ाई नहीं हैँ लोकतंत्र पक्ष और विपक्ष से बनता हैँ । एक पंख कट जाए—तो लोकतंत्र उड़ नहीं सकता।आज भारत के लोकतंत्र का चेहरा कुरूप किया जा रहा हैँ।
कल उसकी लाश पर श्रद्धांजलि दी जाएगी ।
अगर आज नहीं बोले तो कल बोलने का हक भी नहीं बचेगा।अगर आज नहीं जागे तो अगला चुनाव सिर्फ औपचारिकता होगा।जनता ही लोकतंत्र की अंतिम दीवार हैं।और दीवार अगर गिर गई तो फिर कोई संविधान, कोई आयोग, कोई चुनाव कुछ भी नहीं बचाएगा ।
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क्योंकि चुप्पी अब अपराध हैँ।

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