logo
Select Language
Hindi
Bengali
Tamil
Telugu
Marathi
Gujarati
Kannada
Malayalam
Punjabi
Urdu
Oriya

“स्वच्छता के तमगों की पोल खुली: ‘सबसे स्वच्छ शहर’ इंदौर में ज़हरीले पानी से 23वीं मौत — संविधान के अनुच्छेद 21 को खुलेआम रौंदता तंत्र”

मध्य प्रदेश | इंदौर
इंदौर में दूषित पानी पीने से 23वीं मौत ने पूरे तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वही इंदौर, जिसे केंद्र सरकार ने 8 बार “स्वच्छ भारत” का राष्ट्रीय पुरस्कार देकर देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया, आज अपने ही नागरिकों को ज़हर मिला पानी पिला रहा है।
संविधान का अनुच्छेद 21 — “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार” केवल सांस लेने तक सीमित नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के अनुसार इसमें स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल का अधिकार भी शामिल है। इसके बावजूद इंदौर में नागरिकों की मौत यह साबित कर रही है कि ज़मीनी हकीकत और सरकारी दावों के बीच खाई लगातार गहरी होती जा रही है।
प्रशासनिक लापरवाही, नगर निगम की विफल निगरानी और स्वास्थ्य विभाग की सुस्ती ने हालात को भयावह बना दिया है। सवाल यह नहीं है कि इंदौर को कितने अवार्ड मिले, सवाल यह है कि क्या पुरस्कार नागरिकों की जान से ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं?
अगर शहर “स्वच्छ” है, तो पानी जानलेवा कैसे हो गया?
अब तक 23 मौतें कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि संस्थागत अपराध की ओर इशारा करती हैं। यह घटना संविधान की आत्मा, मानवाधिकारों और शासन की नैतिक जिम्मेदारी—तीनों पर सीधा प्रहार है।
जब तक दोषियों पर कठोर कार्रवाई नहीं होती और सुरक्षित पेयजल की गारंटी सुनिश्चित नहीं की जाती, तब तक हर अगला गिलास पानी—एक नया खतरा बना रहेगा।
स्वच्छता के तमगे तब तक खोखले हैं, जब तक नागरिक ज़िंदा नहीं हैं।

37
938 views

Comment