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मकर संक्रांति विशेषांक प्रकाश की विजय और नई शुरुआत का पर्व राजकुमार अश़्क


भारत को पर्वों और त्योहारों की भूमि कहा जाता है, जहाँ प्रत्येक ऋतु, प्रत्येक मौसम और प्रत्येक परिवर्तन को उत्सव के रूप में स्वीकार किया जाता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति केवल आस्था पर नहीं, बल्कि प्रकृति, विज्ञान और जीवन दर्शन पर आधारित है। इन्हीं पर्वों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सार्वदेशिक पर्व है—मकर संक्रांति, जो न केवल भारत बल्कि नेपाल सहित पूरे दक्षिण एशिया में विभिन्न रूपों में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।
मकर संक्रांति उन विरले पर्वों में से है, जो किसी पौराणिक कथा से अधिक खगोलीय घटना पर आधारित है। यह पर्व हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य, विज्ञान के प्रति सम्मान और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का संदेश देता है।
संक्रांति का खगोलीय रहस्य
‘संक्रांति’ शब्द का अर्थ है—सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना। वर्ष में कुल बारह संक्रांतियाँ होती हैं, किंतु इनमें मकर संक्रांति का स्थान सर्वोच्च है। जब सूर्य पौष मास में धनु राशि छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है, तभी मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है।
भारतीय पंचांग सामान्यतः चंद्रमा की गति पर आधारित होता है, किंतु मकर संक्रांति एकमात्र ऐसा पर्व है जो पूर्णतः सूर्य की गति पर आधारित है। यही कारण है कि इसकी तिथि लगभग हर वर्ष 14 या 15 जनवरी को निश्चित रहती है।
इसी दिन से सूर्य उत्तरायण होता है। उत्तरायण का अर्थ है—सूर्य का उत्तर दिशा की ओर गमन। इस परिवर्तन के साथ ही उत्तरी गोलार्ध में दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं। सर्दी का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगता है, और प्रकृति नवजीवन से भर उठती है। पेड़-पौधों में कोपलें फूटती हैं, पक्षियों का कलरव बढ़ता है और खेतों में फसलें लहलहाने लगती हैं।
प्रकाश की यह वृद्धि अंधकार पर विजय का प्रतीक है। जहाँ प्रकाश ज्ञान, चेतना और ऊर्जा का संकेत देता है, वहीं अंधकार अज्ञान और जड़ता का। यही कारण है कि मकर संक्रांति को नई शुरुआत, आशा और उन्नति का पर्व माना जाता है।
वैदिक महत्व और महाभारत का संदर्भ
वेदों और उपनिषदों में उत्तरायण का अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक महत्व वर्णित है। छांदोग्य उपनिषद के अनुसार, जो आत्मा उत्तरायण काल में देह त्यागती है, वह पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाती है, जबकि दक्षिणायण में देह त्यागने वाली आत्मा पुनः जन्म लेती है।
महाभारत में भीष्म पितामह का उदाहरण इसका श्रेष्ठ प्रमाण है। वे इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त थे, किंतु उन्होंने शरशैया पर पड़े-पड़े उत्तरायण की प्रतीक्षा की और मकर संक्रांति के दिन ही अपने प्राण त्यागे। इससे यह सिद्ध होता है कि प्राचीन भारतीय ऋषि-मुनि खगोल विज्ञान के गहन ज्ञाता थे और समय के सूक्ष्म प्रभावों को भलीभाँति समझते थे।
उत्तरायण के बाद सूर्य की ऊर्जा में वृद्धि होती है, जिससे मानव शरीर की कार्यक्षमता, मानसिक स्फूर्ति और सकारात्मकता में बढ़ोतरी होती है। यही कारण है कि इस काल को प्रगति और उन्नति का प्रतीक माना गया है।
भारत भर में सांस्कृतिक विविधता
मकर संक्रांति भारत की सांस्कृतिक एकता का अद्भुत उदाहरण है। देश के प्रत्येक क्षेत्र में यह पर्व अलग नाम और परंपरा के साथ मनाया जाता है—
पंजाब में इसे लोहड़ी कहा जाता है, जहाँ अग्नि प्रज्वलित कर नई फसल का स्वागत किया जाता है।
गुजरात और राजस्थान में पतंग उत्सव पूरे आकाश को रंगीन बना देता है।
तमिलनाडु में पोंगल चार दिवसीय उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिसमें सूर्य, पशु और प्रकृति की पूजा होती है।
उत्तर प्रदेश और बिहार में खिचड़ी पर्व के रूप में यह दिन विशेष महत्व रखता है।
महाराष्ट्र में तिलगुल देकर “गोड गोड बोला” कहने की परंपरा सामाजिक सौहार्द का संदेश देती है।
असम में यह भोगाली बिहू कहलाता है।
कर्नाटक में इसे सुग्गी कहा जाता है।
यह विविधता दर्शाती है कि भले ही परंपराएँ अलग हों, पर भावना एक ही है—प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और जीवन के प्रति उत्सव।
वैज्ञानिक आधार: स्वास्थ्य और प्रकृति का संतुलन
मकर संक्रांति केवल धार्मिक नहीं, बल्कि पूर्णतः वैज्ञानिक पर्व भी है। इस समय सूर्य की किरणें शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी होती हैं। नदी स्नान से त्वचा रोग, जोड़ों का दर्द और श्वसन संबंधी समस्याएँ कम होती हैं।
तिल और गुड़ का सेवन सर्दी में शरीर को ऊष्मा और ऊर्जा प्रदान करता है। तिल में ओमेगा-3 फैटी एसिड, कैल्शियम और प्रोटीन होते हैं, जबकि गुड़ आयरन और खनिज तत्वों से भरपूर होता है। खिचड़ी जैसे सरल और संतुलित भोजन से पाचन तंत्र मजबूत होता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
पतंग उड़ाने से न केवल शारीरिक व्यायाम होता है, बल्कि सूर्य से विटामिन डी भी प्राप्त होता है, जो हड्डियों के लिए आवश्यक है। कृषि आधारित समाज में यह पर्व फसल कटाई के बाद सामूहिक आनंद और संतुलन का प्रतीक भी है।
निष्कर्ष: एक वैश्विक संदेश
मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, विज्ञान, संस्कृति और अध्यात्म का अद्भुत संगम है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में अंधकार चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, अंततः प्रकाश का उदय निश्चित है।
यह हमें स्मरण कराता है कि परिवर्तन ही जीवन का नियम है, और हर परिवर्तन नई संभावनाओं को जन्म देता है। सामूहिक उल्लास, कृतज्ञता और सकारात्मक सोच ही विश्व कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।
मकर संक्रांति वास्तव में मानव जीवन के लिए आशा, ऊर्जा और नवचेतना का उत्सव है।

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