
आरक्षण पर पुनर्विचार का समय : SC/ST में क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस—गरीब दलितों को मिलेगा न्याय या बढ़ेगा सियासी विरोध?
✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा / भोपाल
नई दिल्ली | भोपाल I विशेष रिपोर्ट
देश की आरक्षण व्यवस्था को लेकर वर्षों से उठ रहे सवालों पर अब माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी संकेत दिया है। SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने से जुड़ी जनहित याचिका पर केंद्र एवं सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया गया है। यह कदम केवल कानूनी नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक सुधार की शुरुआत माना जा रहा है।
याचिका का मूल तर्क स्पष्ट है—अनुसूचित जाति एवं जनजाति के आरक्षण का वास्तविक लाभ आज समाज के सबसे वंचित और गरीब वर्ग तक नहीं पहुँच पा रहा, बल्कि उसी वर्ग के आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक रूप से संपन्न लोग बार-बार इसका लाभ लेकर अपने ही समाज के कमजोर तबके के अधिकारों का हनन कर रहे हैं।
जब लाभार्थी ही शोषक बन जाए: आज स्थिति यह है कि IAS, IPS, जज, बड़े अधिकारी और प्रभावशाली नेता, जो स्वयं सभी साधनों से संपन्न हो चुके हैं, वे भी आरक्षण का लाभ लेते हुए स्वयं को आज भी “वंचित” घोषित करते हैं। इतना ही नहीं, वे अपने बच्चों के लिए भी वही लाभ सुनिश्चित कर रहे हैं, जबकि उनके ही समाज के गरीब और संघर्षरत लोग जस के तस हालात में जीवन जीने को मजबूर हैं।
यह प्रश्न अब टाला नहीं जा सकता—क्या एक बार शीर्ष पदों तक पहुँच चुका व्यक्ति सच में वंचित रह जाता है? और यदि नहीं, तो फिर उसके बच्चों को आरक्षण क्यों?
क्रीमी लेयर: समाज को बाँटने नहीं, जोड़ने का उपाय: याचिका में यह स्पष्ट किया गया है कि SC/ST में क्रीमी लेयर लागू होने से आरक्षण खत्म नहीं होगा, बल्कि उसका न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित होगा। इससे वही लोग लाभान्वित होंगे, जिनके लिए आरक्षण की परिकल्पना की गई थी—गरीब, वंचित और अवसर से वंचित नागरिक। जैसा कि OBC और सवर्ण वर्ग (EWS) में क्रीमी लेयर की व्यवस्था लागू है, उसी तर्ज पर SC/ST में भी सामाजिक-आर्थिक आधार पर समीक्षा आज समय की मांग बन चुकी है।
संविधान, सियासत और सच्चाई: संविधान निर्माताओं ने आरक्षण को अस्थायी व्यवस्था के रूप में देखा था, जिसे केवल 10 वर्षों के लिए लागू किया गया था। लेकिन सत्ता की राजनीति और वोट बैंक की मजबूरियों ने इसे समय-समय पर बढ़ाया, बिना यह देखे कि लाभ वास्तव में किसे मिल रहा है।
आज सच्चाई यह भी है कि देश में गरीबी केवल किसी एक जाति तक सीमित नहीं है।
ब्राह्मण, वैश्य, जैन, कायस्थ, राजपूत, सिंधी सहित कई वर्गों में भी व्यापक आर्थिक संकट है, लेकिन जातिगत आरक्षण की जकड़न में उनकी आवाज़ कहीं दब जाती है।
असंतुलन से अराजकता का खतरा: यदि व्यवस्था ऐसी बनी रही कि कम प्रतिशत वाले वर्ग को नौकरी मिले और अधिक प्रतिशत वाला बेरोजगार रहे, तो सामाजिक असंतोष और जातिगत टकराव बढ़ना स्वाभाविक है। यह स्थिति देश की एकता और विकास—दोनों के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट का कदम—एक ऐतिहासिक अवसर: सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी करना इस बात का संकेत है कि अब भावनाओं नहीं, तथ्यों और न्याय के आधार पर निर्णय का समय आ गया है। यह फैसला यदि सही दिशा में जाता है, तो यह सबका साथ, सबका विकास के वास्तविक अर्थ को साकार करेगा।
जनहित अपील: यह मुद्दा किसी एक वर्ग के विरोध का नहीं, बल्कि देश के भविष्य और सामाजिक संतुलन का है। यदि सच में समाजसेवा करनी है, तो संपन्न वर्ग को स्वयं आगे आकर त्याग का उदाहरण पेश करना होगा, ताकि उनके समाज का गरीब और उपेक्षित वर्ग भी सम्मान के साथ आगे बढ़ सके।
यही सच्चा न्याय है। यही वास्तविक समाजसेवा है।