
सरधना की राजनीति में बढ़ती सामाजिक खाई: चुनावी जमीन की खेती या भविष्य की चुनौती?
सरधना विधानसभा क्षेत्र इन दिनों केवल राजनीतिक रूप से ही नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। कपसाड़ से लेकर ज्वालागढ़, सलावा और टेहरकी तक की घटनाओं ने यह संकेत दे दिया है कि राजनीति अब सिर्फ मंचों और भाषणों तक सीमित नहीं रही, बल्कि समाज की जड़ों तक असर डालने लगी है। एक ओर भाजपा के पूर्व विधायक संगीत सोम हैं, जो खुले तौर पर खुद को ठाकुरों के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करते दिखते हैं, वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के विधायक अतुल प्रधान हैं, जो दलित-पिछड़ों की आवाज बनने का दावा करते हुए मोर्चा संभाले हुए हैं।
चुनावी दृष्टि से यह टकराव भले ही दोनों नेताओं के लिए लाभकारी प्रतीत हो, लेकिन सामाजिक दृष्टिकोण से इसके नतीजे चिंताजनक हैं। गांव-गांव में ठाकुर बनाम दलित-पिछड़ा का नैरेटिव गहराता जा रहा है। राजनीतिक बयानबाजी अब सामाजिक रिश्तों में खटास घोल रही है। सोशल मीडिया इस टकराव का सबसे बड़ा अखाड़ा बन चुका है, जहां दोनों खेमों के समर्थक एक-दूसरे पर अश्लील और आपत्तिजनक टिप्पणियां करने से भी नहीं चूक रहे। सवाल यह है कि क्या यह जुबानी जंग किसी दिन वास्तविक टकराव में नहीं बदलेगी?
संगीत सोम की राजनीति लंबे समय से आक्रामक हिंदुत्व और एक खास बिरादरी के समर्थन के इर्द-गिर्द घूमती रही है। भाजपा की सत्ता होने के बावजूद उनका लगातार एक ही सामाजिक समूह के बचाव में खड़ा रहना, 2027 के विधानसभा चुनाव में अन्य जातियों और वर्गों की नाराजगी को जन्म दे सकता है। मुस्लिम समाज के प्रति उनकी खुली सख्ती और हालिया पॉडकास्ट में दिया गया बयान कि उन्हें मुस्लिम वोट नहीं चाहिए, उनकी राजनीति की सीमाओं को भी उजागर करता है।
वहीं अतुल प्रधान भी जवाबी हमलों में पीछे नहीं हैं। संगीत सोम को “झूठा सम्राट” बताने से लेकर मीट फैक्टरी और मोईन कुरैशी के साथ साझेदारी जैसे आरोप लगाकर उन्होंने सियासी तापमान और बढ़ा दिया है। यह रणनीति उन्हें दलित-पिछड़ों में मजबूती दे सकती है, लेकिन इससे सामाजिक ध्रुवीकरण और तेज होता दिख रहा है।
असल सवाल यह है कि क्या सरधना की राजनीति केवल जातीय खांचों में सिमटकर रह जाएगी, या फिर कोई ऐसा नेतृत्व उभरेगा जो कपसाड़, ज्वालागढ़ और सलावा जैसे गांवों में बढ़ती सामाजिक खाई को पाटने का प्रयास करे। अगर राजनीति ने समय रहते संयम नहीं दिखाया, तो यह चुनावी लड़ाई क्षेत्र के सामाजिक ताने-बाने पर स्थायी दाग छोड़ सकती है।