
तनाव मुक्ति का नया अधिकार
दुनियाभर में डिजिटल क्रांति, सूचना-प्रौद्योगिकी, इंटरनेट और स्मार्टफ़ोन के तेज़ प्रसार के बाद कंपनियों में कर्मचारियों से काम के घंटों के बाद भी ईमेल, मोबाइल या मैसेजिंग के जरिए संपर्क साधने की प्रवृत्ति बढ़ गई है। लगातार काम से जुड़े संपर्क के कारण मानसिक और शारीरिक तनाव बढ़ने के उदाहरण देखने को मिल रहे हैं।
इसी का समाधान खोजते हुए सबसे पहले यूरोप में “राइट टू डिस्कनेक्ट” की अवधारणा पर विचार किया गया। काम के घंटों के पूरा होने के बाद भी कई लोगों को काम से जुड़े ईमेल और कॉल्स का जवाब देना पड़ता है। कर्मचारियों को इससे राहत दिलाने और कानूनी सुरक्षा प्रदान करने के लिए पिछले कुछ वर्षों से “राइट टू डिस्कनेक्ट” अधिकार पर चर्चा हो रही है। संसद में पेश किए गए विधेयक में सांसद सुप्रिया सुले ने कर्मचारी कल्याण प्राधिकरण की स्थापना का प्रावधान रखा है।
इस विधेयक में कर्मचारियों को काम के समय से अधिक और काम से जुड़े कॉल या ईमेल का जवाब न देने का अधिकार, अर्थात “राइट टू डिस्कनेक्ट” प्रदान किया गया है। सुप्रिया सुले ने कहा कि कर्मचारियों के व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में तनाव कम करने के लिए उन्हें डिस्कनेक्ट होने का अधिकार मिलना चाहिए।
ऑनलाइन नौकरियाँ शुरू होने के बाद से ही कर्मचारी कॉल्स और ईमेल के जाल में फँसे हुए थे और आज भी फँसे हैं। कम से कम इस नए विधेयक से कर्मचारियों का मानसिक तनाव और ऑफिस के बाद का कामकाजी दबाव कम होने की उम्मीद की जा सकती है।