logo
Select Language
Hindi
Bengali
Tamil
Telugu
Marathi
Gujarati
Kannada
Malayalam
Punjabi
Urdu
Oriya

हिंदुत्व की समस्या की अंधभक्ति का शिखर धर्म में राजनीति या राजनीति में धर्म, क्या किसी और धर्म के ईश्वर या उसके अनुयायियों के द्वारा ये सब हो सकता है

नकली कहूँ तो बुरा लगेगा, इसलिए शब्दों में सावधानी ज़रूरी है। जिन्हें सचमुच यह विश्वास है कि यही कोई “अवतारी” आ गया है तो उन्हें कम से कम इस विष्णु भगवान के भी दर्शन कर ही लेने चाहिए, क्या पता भगवान की कृपा बरसे और आप महरूम हो जाएं।

साथ ही हनुमान जी के उस रूप को भी देख लेना चाहिए, जहाँ उन्हें पतंग की तरह उड़ाया जा रहा है और उड़ाने वाला कौन है? कहां तक पढ़ा है? उसका बैकग्राउंड क्या है? साधारण है या महामानव है, वह भी देख लीजिए.. यहां आप के पेशेंस की टेस्टिंग हो रही है कि आप किसी को कितना नीचे गिरने की इजाजत और स्वीकृति देते जा रहे हैं।

यह कोई एक साधारण घटना नहीं है, यह एक क्रम है पतन का, जो धीरे-धीरे, सुनियोजित ढंग से गिरता जा रहा है।

आप को याद होगा, पहले राम को छोटा करके मंदिर ले जाते दिखाया गया, किस हैसियत से दिखाया गया, किस उद्देश्य से दिखाया गया, आपके विवेक पर निर्भर है। लेकिन आपने आपत्ति नहीं की, क्यों नहीं की आप जाने?

फिर काशी कॉरिडोर के नाम पर ऐतिहासिक मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ा गया जो हमारी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा थीं, जनता के रूप में आप मौन रहे।

तिरुपति में विष्णु की प्रतिमा के सामने ऐसे चित्र खिंचवाए गए कि मानो बालाजी स्वयं उपस्थित हों गए हो लेकिन लोगों ने इस पतन को भी आस्था के रूप में स्वीकार कर लिया।

सोमनाथ यात्रा में शिव रूप धारण किया गया, तालियाँ बजीं, कैमरे की चकाचौंध में कार्यक्रम ऐसे प्रायोजित किया गया जैसे महामानव अवतरित हो गए हों।

हनुमान जी को पतंग की तरह उड़ाया गया लेकिन किसी की आस्था और भावना आहत नहीं हुई। लोग और भक्त आनंदित हैं।

यहाँ प्रश्न किसी एक धर्म या किसी एक व्यक्ति का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या किसी अन्य धर्म में अपने ईष्ट के ऐसे प्रतीकात्मक विस्थापन को सहज स्वीकार किया जा सकता?

क्या कोई स्वयं को बुद्ध, नानक, ईसा मसीह या मुहम्मद साहब की जगह प्रस्तुत करे और अनुयायी उसे श्रद्धा का विषय बना लें वो भी बिना विरोध के? क्या संभव है?

हिंदू धर्म की उदारता और सहिष्णुता सदियों से उसकी शक्ति रही है। परंतु यही उदारता जब राजनीतिक प्रबंधन में बदल जाए, तो वह आस्था नहीं, प्रयोग बन जाती है।

आज दृश्य यह है कि एक राजनीतिक व्यक्तित्व, प्रतीकों के माध्यम से, स्वयं को देवताओं की जगह लेता जा रहा है और कभी कभी उनसे भी ऊपर खुद को स्थापित करता हुआ दिख रहा है।

हनुमान जी को पतंग की तरह उड़ाया जा रहा है, और आप इस धोखे और अपमान से बेखबर हैं।

सच कहूँ तो यह एक सामाजिक टेस्टिंग है, यह परखा जा रहा है कि भक्ति की सीमा कहाँ तक जा सकती है।

लोग किस हद तक किसी व्यक्ति को पूज सकते हैं, और किस हद तक अपने ईष्ट के प्रतीकात्मक अपमान को सहन कर सकते हैं।

जब कोई स्वयं को अवतार कहे, दशरथ का पुत्र बताए, और समाज उसे बिना प्रश्न स्वीकार कर ले तो अगला कदम अनुमान से परे नहीं होना चाहिए।

जिस दिन यह विश्वास पुख्ता हो जाएगा कि भक्ति पूरी तरह अंधी हो चुकी है, उस दिन देवालयों में ईश्वर के साथ साथ इस व्यक्ति की मूर्तियाँ भी स्थापित कर दी जाएंगी, ऐसा प्रतीत हो रहा है।

उसके बाद सरकारी फरमान आएँगे, और श्रद्धा का प्रमाण सोशल मीडिया पर तस्वीरों के रूप में माँगा जाएगा।

प्रमाण के रूप में इस नए भगवान का जयकारा लगाना अनिवार्य किया जा सकता है वरना आप हिन्दू कैसे कहलाए जायेंगे?

मै इससे ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा, धर्म आपका, व्यवस्था आपका, भगवान आपके, सरकार आपकी, आप इन्हें सम्मान करें, खिलौना बनाएं, पतंग बनाएं, अपमानित करें, आपकी मर्जी, हम सिर्फ तमाशा देख सकते हैं की एक नेता किस हद तक नीचे गिर सकता है और आप उस पतन को किस लेवल तक सपोर्ट कर सकते हैं, किस लेवल तक बर्दाश्त कर सकते हैं?

29
3211 views

Comment