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संविधान की समरसता बनाम नीतिगत विभाजन : देश किस दिशा में जा रहा है?

उमरिया |
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, सम्मान और समरसता का अधिकार देता है। परंतु हाल के वर्षों में यह प्रश्न गंभीर रूप से उठने लगा है कि क्या ये मूल्य अब केवल मंचों, भाषणों और दस्तावेज़ों तक सीमित रह गए हैं।

आज समाज को जोड़ने के बजाय नीतिगत और वैचारिक स्तर पर उसे विभिन्न वर्गों और पहचानों में विभाजित करने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। यदि किसी भी नीति या विधेयक का प्रभाव समाज में असुरक्षा, अविश्वास और भय उत्पन्न करता है, तो उस पर पुनर्विचार करना एक लोकतांत्रिक दायित्व बन जाता है।

विशेषकर शिक्षा से संबंधित हालिया नीतिगत चर्चाएँ और University Grants Commission से जुड़े प्रस्तावित बदलाव, समाज के बड़े वर्ग में चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। शिक्षा किसी भी राष्ट्र की बौद्धिक और नैतिक रीढ़ होती है। यदि शिक्षा व्यवस्था योग्यता और समावेशन के बजाय वर्गीय पहचान के आधार पर देखी जाएगी, तो इसका दीर्घकालिक प्रभाव सामाजिक संतुलन पर पड़ेगा।

यह कहना कि किसी एक समुदाय या वर्ण विशेष द्वारा ही अत्याचार हुआ है, ऐतिहासिक और सामाजिक तथ्यों का सरलीकरण है। अत्याचार किसी जाति का स्वभाव नहीं, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग और संवेदनहीन मानसिकता का परिणाम होता है। भारत की विविधता की शक्ति इसी में है कि सभी समुदायों ने साथ रहकर देश के निर्माण में योगदान दिया है।

चिंताजनक यह है कि कुछ नीतिगत संकेत समाज के एक वर्ग में अस्तित्व संबंधी भय को जन्म दे रहे हैं—जहाँ लोग स्वयं को हाशिये पर धकेला हुआ महसूस कर रहे हैं। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र में कानून का उद्देश्य सुरक्षा और विश्वास पैदा करना होना चाहिए, न कि डर और विभाजन।

इतिहास साक्षी है कि जब संवाद की जगह टकराव, और समाधान की जगह आरोप ले लेते हैं, तब अराजकता जन्म लेती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, नीति-निर्माता और समाज के सभी वर्ग खुले संवाद के माध्यम से संविधान की मूल भावना—समरसता, न्याय और समान अवसर—की रक्षा करें।

यह प्रेस वक्तव्य किसी भी समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन, संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता की रक्षा के लिए एक सकारात्मक विमर्श की अपील है।

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