मनरेगा घोटाला: परतावल ब्लॉक में 77 कार्यों की जाँच शुरू, BDO से मांगा गया जवाब
• ब्लॉक स्तर पर अधिकारी कर रहे हैं बीडीओ की जांच
• एक अरोपी बीडीओ ने टीम बनाई दूसरा अरोपी एपीओ जांच अधिकारी
महराजगंज: परतावल ब्लॉक की कई ग्राम पंचायतों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) कार्यों में बड़े पैमाने पर अनियमितता के गंभीर आरोपों के बाद, प्रशासन हरकत में आ गया है। शिकायत सामने आने पर, जिला प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए खंड विकास अधिकारी (BDO) से जवाब-तलब किया है और जाँच के आदेश दिए हैं।
खड़ी फसल पर 'कागजी' काम
शिकायतकर्ता योगेश ने आरोप लगाया है कि नवंबर माह के अंत तक गेहूं की बुवाई पूरी हो जाती है और वर्तमान में खेतों में फसल खड़ी है। इसके बावजूद दिसंबर और जनवरी माह में निजी खेतों में खेत समतलीकरण और मेड़बंदी के कार्य कागजों में दर्शाए गए, जो कि नियमों का सीधा उल्लंघन है। तराई क्षेत्र होने के कारण समय पर बुवाई होती है, ऐसे में इन कार्यों को वित्तीय अनियमितता माना जा रहा है।
जाँच समिति गठित: अधिकारियों पर क्या होगी कार्रवाई?
प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए ब्लॉक स्तर पर तीन सदस्यीय जाँच समिति का गठन किया गया है। डीसी मनरेगा गौरवेंद्र सिंह ने स्वयं इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए परतावल के BDO से स्पष्टीकरण मांगा है।
शिकायत में BDO, APO (सहायक कार्यक्रम अधिकारी), FTO (फंड ट्रांसफर ऑर्डर जारी करने वाले अधिकारी) सहित अन्य मनरेगा कर्मियों की संलिप्तता का भी आरोप लगाया गया है। कानूनी पहलुओं के अनुसार:
• BDO और APO की भूमिका: ये अधिकारी मनरेगा कार्यों के क्रियान्वयन, पर्यवेक्षण और भुगतान के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार होते हैं। यदि अनियमितताएँ साबित होती हैं, तो इन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई के अलावा सरकारी धन के गबन (Embezzlement) का आपराधिक मामला भी दर्ज हो सकता है।
• दोष सिद्ध होने पर: कानूनी प्रावधानों के तहत, न केवल नौकरी से बर्खास्तगी हो सकती है, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की वित्तीय वसूली भी वेतन या संपत्ति कुर्क करके की जा सकती है। यह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के दायरे में भी आ सकता है।
77 कार्य संदेह के घेरे में
शिकायत के अनुसार, परतावल ब्लॉक की 21 ग्राम पंचायतों में मनरेगा के तहत समतलीकरण से जुड़े कुल 77 कार्य दर्ज किए गए थे, जिनमें से अधिकांश प्रगतिरत या स्वीकृत दिखाए गए थे। अब ये सभी कार्य जाँच के दायरे में हैं।
प्रशासन का कहना है कि जाँच रिपोर्ट के आधार पर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
मनरेगा (MGNREGA) फंड का दुरुपयोग रोकने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण उपाय किए हैं, जिनमें तकनीकी हस्तक्षेप और सामुदायिक निगरानी दोनों शामिल हैं:
• डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT): श्रमिकों का वेतन सीधे उनके बैंक या डाकघर खातों में भेजा जाता है, जिससे बिचौलियों की भूमिका खत्म हो जाती है और पैसे की हेराफेरी रुकती है।
• आधार-आधारित भुगतान प्रणाली (ABPS): मजदूरी का भुगतान आधार संख्या से जुड़े खातों के माध्यम से किया जाता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि भुगतान सही लाभार्थी को मिले और 'घोस्ट वर्कर' (कागजों में मौजूद, लेकिन असल में काम न करने वाले) खत्म हों।
• राष्ट्रीय मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम (NMMS) ऐप: कार्यस्थल पर श्रमिकों की उपस्थिति जियो-टैग की गई तस्वीरों के साथ दिन में दो बार ली जाती है, जिससे फर्जी हाजिरी पर रोक लगती है।
• सोशल ऑडिट (सामाजिक अंकेक्षण): ग्राम सभा को यह अधिकार है कि वह सभी कार्यों और खर्चों का नियमित रूप से सामाजिक अंकेक्षण (जाँच) करे। यह हर छह महीने में कम से कम एक बार अनिवार्य है।
• ई-मस्टर रोल और ऑनलाइन डेटा: सभी लेनदेन और मस्टर रोल (हाजिरी रजिस्टर) को 'नरेगा सॉफ्ट' नामक ऑनलाइन पोर्टल पर सार्वजनिक किया जाता है, जिसे कोई भी देख सकता है।
• शिकायत निवारण तंत्र: जिला स्तर पर लोकपाल (Ombudsman) नियुक्त किए गए हैं, जहाँ लोग अपनी शिकायतें दर्ज करा सकते हैं। इसके लिए टोल फ्री हेल्पलाइन नंबर भी उपलब्ध हैं।
• जियो-टैगिंग: कार्यों की योजना बनाने, चल रहे काम और पूरा होने के बाद तीन अलग-अलग स्तरों पर तस्वीरों को जियो-टैग करके अपलोड किया जाता है, जिससे भौतिक सत्यापन आसान हो जाता है।
इन उपायों का उद्देश्य प्रणाली में जवाबदेही बढ़ाना और यह सुनिश्चित करना है कि फंड का उपयोग ईमानदारी से हो और वास्तविक ग्रामीण परिवारों को ही इसका लाभ मिले।
तमाम सुरक्षा उपायों के बावजूद भ्रष्टाचार के मामले सामने आने के पीछे कुछ प्रमुख प्रणालीगत कमियाँ और जमीनी हकीकतें हैं:
भ्रष्टाचार के मुख्य कारण
• प्रौद्योगिकी में सेंध और तकनीकी चुनौतियाँ:
o NMMS ऐप या जियो-टैगिंग का उपयोग करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्या होती है, जिससे वास्तविक समय की निगरानी मुश्किल हो जाती है।
o तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर अधिकारी कभी-कभी पुरानी तस्वीरें अपलोड कर देते हैं या लोकेशन डेटा को मैनिपुलेट (हेरफेर) कर लेते हैं।
• स्थानीय स्तर पर मिलीभगत (The Nexus):
o सबसे बड़ी समस्या ग्राम प्रधान, BDO, APO और तकनीकी सहायकों के बीच सांठगांठ है। यह मजबूत नेटवर्क निगरानी तंत्र को कमजोर कर देता है।
o राजनीतिक दबाव और स्थानीय प्रभाव के कारण सोशल ऑडिट अक्सर निष्पक्ष नहीं हो पाते, या उनकी रिपोर्ट पर समय पर कार्रवाई नहीं होती।
• जागरूकता और सशक्तिकरण की कमी:
o कई मजदूरों को अपने अधिकारों, न्यूनतम मजदूरी की दर, या शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया के बारे में पूरी जानकारी नहीं होती।
o अशिक्षा और जागरूकता की कमी उन्हें स्थानीय अधिकारियों द्वारा आसानी से हेरफेर करने योग्य बनाती है।
• धीमी और जटिल कानूनी कार्रवाई:
o भ्रष्टाचार साबित होने के बावजूद, दोषी अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया बहुत लंबी और जटिल होती है।
o इस देरी के कारण अक्सर शिकायतकर्ता हतोत्साहित हो जाते हैं और भ्रष्टाचार जारी रहता है।
संक्षेप में, भले ही नियम कड़े हों, लेकिन कार्यान्वयन में ईमानदारी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण ये लूपहोल बने रहते हैं, जिनका फायदा उठाकर फंड का दुरुपयोग किया जाता है।
मनरेगा में व्यक्तिगत कार्यों के लिए जियो-टैगिंग लागू न करने के कारण ही परतावल जैसे घोटालों की गुंजाइश बनती है।
कार्यों में जियो-टैगिंग के नियम और कारण
• अनिवार्य प्रावधान: मनरेगा के दिशानिर्देशों के अनुसार, व्यक्तिगत लाभार्थी कार्यों सहित सभी परिसंपत्तियों को पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए 'जियो-मनरेगा' (GeoMGNREGA) परियोजना के तहत तीन चरणों में जियो-टैग किया जाना आवश्यक है:
1. Stage 1 (कार्य शुरू होने से पहले): कार्यस्थल के स्थान की जियो-टैगिंग।
2. Stage 2 (कार्य के दौरान): चल रहे काम की दो तस्वीरों के साथ जियो-टैगिंग।
3. Stage 3 (कार्य पूरा होने के बाद): पूर्ण परिसंपत्ति की अंतिम जियो-टैगिंग।
• उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य परिसंपत्तियों की ऑनलाइन रिकॉर्डिंग और निगरानी सुनिश्चित करना है ताकि रिसाव (पैसे की हेराफेरी) को रोका जा सके और जवाबदेही तय की जा सके।
जियो-टैगिंग न होने के कारण होने वाली समस्याएं
जियो-टैगिंग का प्रावधान होने के बावजूद, परतावल जैसी जगहों पर इसका पालन न होने से कई गंभीर समस्याएँ पैदा होती हैं:
• फर्जी काम दिखाना: चूँकि भौतिक सत्यापन के लिए जियो-टैग की गई तस्वीरें उपलब्ध नहीं होतीं, इसलिए अधिकारी और कर्मचारी आसानी से कागजों पर काम दिखाकर फंड निकाल लेते हैं, जैसा कि परतावल में "खड़ी फसल के बीच समतलीकरण" के मामले में हुआ।
• निगरानी में कमी: जियो-टैगिंग के बिना, यह सत्यापित करना असंभव हो जाता है कि काम वास्तव में जमीन पर हुआ है या नहीं, या यह निर्दिष्ट स्थान पर हुआ है या नहीं।
• डेटा में हेरफेर: ऑनलाइन डेटा को आसानी से हेरफेर किया जा सकता है यदि वास्तविक स्थान और समय-मुद्रांकित तस्वीरें (time-stamped photographs) उपलब्ध न हों।
संक्षेप में, जियो-टैगिंग की अनिवार्यता का पालन न करना ही भ्रष्टाचार का मुख्य कारण बन जाता है।
VB-G RAM G में जियो-टैगिंग के प्रावधान
• डिजिटल गवर्नेंस पर जोर: नया VB-G RAM G अधिनियम पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए डिजिटल तकनीक के उपयोग पर बहुत अधिक जोर देता है। इसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि जीपीएस और मोबाइल-आधारित निगरानी प्रणाली (GPS and mobile-based monitoring) का उपयोग किया जाएगा।
• सभी कार्य शामिल: यह प्रणाली न केवल सार्वजनिक कार्यों बल्कि व्यक्तिगत लाभार्थी कार्यों सहित सभी परिसंपत्तियों के लिए लागू होती है। मनरेगा के तहत भी व्यक्तिगत परिसंपत्तियों की जियो-टैगिंग में बड़ा विस्तार देखा गया था, और नए कानून में इसे और सशक्त किया जा रहा है।
• धोखाधड़ी रोकने का मुख्य हथियार: परतावल जैसे मामलों में जहाँ जियो-टैगिंग की कमी के कारण भ्रष्टाचार हुआ, वहीं VB-G RAM G कानून ऐसी अनियमितताओं को रोकने के लिए AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस), बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और अनिवार्य जियो-टैगिंग जैसी सुविधाओं को डिफ़ॉल्ट रूप से लागू करता है।
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ब्लॉक स्तर पर अधिकारी कर रहे हैं बीडीओ की जांच
• एक अरोपी बीडीओ ने टीम बनाई दूसरा अरोपी एपीओ जांच अधिकारी
यह जानकारी अत्यंत गंभीर है और न्याय के प्राकृतिक सिद्धांत (Natural Justice) के विरुद्ध है। यदि आरोप सही हैं कि आरोपी अधिकारी ने ही जाँच समिति का गठन किया है और वही जाँच अधिकारी है, तो यह हितों के टकराव (Conflict of Interest) का एक स्पष्ट मामला है।
हितों का टकराव (Conflict of Interest) और कानूनी स्थिति
• निष्पक्ष जाँच का अधिकार: आपराधिक न्यायशास्त्र इस सिद्धांत पर टिका है कि आरोपी को निष्पक्ष जाँच का अधिकार है। यदि जाँच अधिकारी स्वयं आरोपी है, तो निष्पक्षता की उम्मीद नहीं की जा सकती।
• जाँच की विश्वसनीयता: जाँच अधिकारी का दृष्टिकोण पक्षपाती (biased) होने की संभावना होती है, जिससे जाँच के निष्कर्षों की विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है।
• सर्वोच्च न्यायालय का रुख: हालांकि कुछ मामलों में अदालतों ने कहा है कि केवल इस आधार पर जाँच पूरी तरह से रद्द नहीं होगी कि शिकायतकर्ता/मुखबिर ही जाँच अधिकारी है, लेकिन यह मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। अदालतें ऐसे मामलों में बेहद सतर्क रहती हैं और सुनिश्चित करती हैं कि न्याय प्रक्रिया बाधित न हो।
• विभागीय कार्रवाई: प्रशासनिक और सतर्कता दिशानिर्देश स्पष्ट रूप से कहते हैं कि जिस व्यक्ति पर आरोप लगे हों, उसे अपनी ही जाँच नहीं करनी चाहिए। यदि ऐसा होता है, तो उच्च अधिकारी (जैसे जिलाधिकारी या मुख्य विकास अधिकारी) इस जाँच को रद्द करके एक स्वतंत्र और निष्पक्ष टीम का गठन कर सकते हैं, जिसमें बाहरी ब्लॉक या जिले के अधिकारी शामिल हों।