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इंजीनियरिंग का 'अजूबा' या जनता के पैसों की बर्बादी? मुंबई के नए फ्लाईओवर पर सवालिया निशान

मुंबई, जिसे सपनों का शहर कहा जाता है, अक्सर अपनी बुनियादी ढांचे (Infrastructure) की समस्याओं के लिए सुर्खियों में रहता है। हाल ही में, मीरा-भायंदर में बना नया डबल-डेकर फ्लाईओवर उद्घाटन से पहले ही चर्चा और चिंता का विषय बन गया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे दृश्यों ने न केवल आम जनता बल्कि विशेषज्ञों को भी यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या यह 'विकास' है या भविष्य की 'मुसीबत'?
​आपत्ति का मुख्य कारण: 4 लेन का 'फनल' (Funnel) डिजाइन
​इस फ्लाईओवर पर सबसे बड़ी आपत्ति इसके विचित्र डिजाइन को लेकर है। करोड़ों की लागत से बना यह फ्लाईओवर शुरू तो 4 लेन की चौड़ाई के साथ होता है, लेकिन आगे चलकर अचानक यह 2 लेन में सिमट जाता है।
​एक आम नागरिक की नजर से देखें, तो यह एक 'बोटलनेक' (Bottleneck) है। जब तेज रफ्तार गाड़ियां 4 लेन से अचानक 2 लेन में प्रवेश करने की कोशिश करेंगी, तो वहां ट्रैफिक जाम होना तय है। इससे भी गंभीर बात यह है कि यह पॉइंट एक 'एक्सीडेंट प्रोन जोन' (दुर्घटना संभावित क्षेत्र) बन सकता है। जिस प्रोजेक्ट का उद्देश्य ट्रैफिक कम करना था, वह खुद ट्रैफिक जाम का कारण बनता दिख रहा है।
​जिम्मेदार कौन? (किन लोगों का सहयोग है)
​इस प्रोजेक्ट में किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी एक 'चेन' (Chain) का सहयोग और इंवॉल्वमेंट है, जिनकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए:
​MMRDA (मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण): यह प्रोजेक्ट MMRDA की देखरेख में है। सबसे बड़ी जिम्मेदारी उनकी प्लानिंग विंग की है। क्या नक्शा पास करते समय उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि 4 लेन का ट्रैफिक 2 लेन में कैसे समाएगा?
​अर्बन प्लानर्स और कंसल्टेंट्स: करोड़ों रुपये की फीस लेने वाले डिजाइन कंसल्टेंट्स और आर्किटेक्ट्स, जिन्होंने इस नक्शे को मंजूरी दी। उनकी दूरदर्शिता पर सवाल उठना लाजमी है।
​कांट्रैक्टर्स (Contractors): हालाँकि कांट्रैक्टर वही बनाते हैं जो नक्शे में होता है (इस केस में J Kumar Infraprojects और अन्य एजेंसियां जो मेट्रो लाइन 9 पर काम कर रही हैं), लेकिन जमीनी स्तर पर तकनीकी खामियों को उजागर करना भी उनकी नैतिक जिम्मेदारी होती है।
​विशेष टिप्पणी (Editorial Comment)
​MMRDA ने अपनी सफाई में कहा है कि यह डिजाइन "भविष्य के विस्तार" (Future Expansion) को ध्यान में रखकर बनाया गया है और जगह की कमी (Right of Way) के कारण ऐसा करना पड़ा।
​लेकिन, सवाल यह है:
​क्या 'भविष्य' के नाम पर 'वर्तमान' की सुरक्षा से खिलवाड़ जायज है?
​क्या मुंबई जैसे शहर में, जहां एक इंच जगह के लिए संघर्ष है, वहां ऐसी प्लानिंग की अनुमति कैसे मिली जहां पिलर और सड़क का तालमेल ही नहीं है?
​यह केवल एक फ्लाईओवर का मुद्दा नहीं है; यह हमारे सरकारी सिस्टम की उस मानसिकता का प्रतीक है जहां प्रोजेक्ट को 'पूरा' करना प्राथमिकता है, उसे 'सही' बनाना नहीं। जनता के टैक्स के पैसों से बने इस ढांचे का अगर सही इस्तेमाल नहीं हो पाया, तो यह आधुनिक इंजीनियरिंग पर एक बदनुमा दाग होगा।

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