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सहकार में उबाल पैक्स कर्मचारियों का सरकार को अल्टीमेटम 11 फरवरी तक निर्णय नहीं हुआ तो सहकारी व्यवस्था ठप


सहकार में उबाल पैक्स कर्मचारियों का सरकार को अल्टीमेटम

11 फरवरी तक निर्णय नहीं हुआ तो सहकारी व्यवस्था ठप

जयपुर। (राजेश खारड़ू)ग्राम सेवा सहकारी समितियों में कार्यरत कर्मचारियों की लंबित मांगों को लेकर सहकारिता विभाग और सरकार पर दबाव तेज हो गया है। राजस्थान सहकारी कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि 11 फरवरी तक कर्मचारियों के हित में लिखित आदेश जारी नहीं किए गए तो प्रदेशभर में सहकारी तंत्र को ठप करने का आंदोलन शुरू किया जाएगा।

संघर्ष समिति के संयोजक हनुमान सिंह राजावत, मदन मेनारिया और कुलदीप जंगम के नेतृत्व में कर्मचारियों ने बताया कि उनकी मांगें वर्षों से लंबित हैं। तीन चरणों में हुई वार्ताओं के बावजूद सहकारिता विभाग की ओर से किसी भी मांग पर ठोस निर्णय सामने नहीं आया है। कर्मचारियों का कहना है कि हर बैठक के बाद फाइलें आगे बढ़ने के बजाय ठंडे बस्ते में चली जाती हैं।

समिति के वरिष्ठ सदस्यों पुंजराज सिंह सोढा, देवेंद्र सेदावत और नरपत सिंह चारण ने कहा कि विभागीय स्तर पर सकारात्मक माहौल जरूर दिखाया गया, लेकिन नतीजा शून्य रहा। सत्यनारायण तिवाड़ी और टीकेंद्र कटारा का कहना है कि अब कर्मचारी केवल आश्वासन नहीं बल्कि लिखित आदेश चाहते हैं।

संघर्ष समिति के सदस्यों बलदेवराम गेट, हेमंत कुमार व्यास और प्रकाश नागर ने चेताया कि समय रहते निर्णय नहीं हुआ तो केंद्रीय सहकारी बैंकों में जमा एफडी और आरडी की निकासी की जाएगी। कर्मचारियों के शेयर कैपिटल की वापसी के साथ ग्राम सेवा सहकारी समितियों से ऋण वितरण का बहिष्कार भी किया जाएगा।

समिति के अनुसार पवन कुमार पुनिया, कृष्णपाल सिंह जोधाणा और महिपाल सिंह देवड़ा ने सरकार को आगाह किया है कि आंदोलन की स्थिति में अल्पकालीन फसली ऋण वितरण व्यवस्था प्रभावित होगी, जिसका सीधा असर किसानों पर पड़ेगा। वहीं नारायण सिंह राजपुरोहित, शिवचरण शर्मा और अमित हड़ोला का कहना है कि कर्मचारियों की मांगें पूरी होने तक पैक्स कंप्यूटरीकरण योजना को आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा।

संघर्ष समिति के संयोजक हनुमान सिंह राजावत ने कहा कि बजट से पहले यदि कर्मचारियों के हित में निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन और अधिक उग्र होगा। इसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार और सहकारिता विभाग की होगी।

साफ संदेश दिया गया है कि अब सहकारिता में सिर्फ संवाद नहीं बल्कि निर्णय का समय आ चुका है।

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