डिजिटल नशे पर लगाम जरूरी
फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और टिकटॉक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बच्चों के लिए “नशीले पदार्थों” जितने खतरनाक साबित हो रहे हैं, ऐसा गंभीर आरोप लगाया गया है। इन कंपनियों को अमेरिकी अदालत में कटघरे में खड़ा किया गया है और उनके खिलाफ लगभग 1600 लोगों ने मुकदमे दायर किए हैं। इन मामलों में आरोप है कि सोशल मीडिया कंपनियाँ जानबूझकर बच्चों में लत लगाने वाला व्यवहार बढ़ा रही हैं। इसी वजह से इस कानूनी लड़ाई की तुलना 1990 के दशक के प्रसिद्ध ‘तंबाकू मामलों’ से की जा रही है, जिनके बाद सिगरेट कंपनियों पर दुनिया भर में कड़े प्रतिबंध लगाए गए थे।
अगर इस मुकदमे का फैसला बच्चों के पक्ष में आता है, तो पूरा सोशल मीडिया उद्योग अपनी कार्यप्रणाली बदलने के लिए मजबूर हो सकता है। इससे पहले टिकटॉक और स्नैपचैट कुछ मामलों में अदालत के बाहर समझौता कर चुके हैं। आरोप है कि इन ऐप्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि बच्चों में नशे जैसी लत लगती है और उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है। एंडलेस स्क्रॉलिंग, एल्गोरिदम और लगातार आने वाली नोटिफिकेशन्स बच्चों को घंटों स्क्रीन से चिपकाए रखती हैं। यह मुकदमा किसी खास पोस्ट या वीडियो के खिलाफ नहीं, बल्कि ऐप्स के पूरे डिजाइन के खिलाफ है। कंपनियों पर बच्चों के मनोविज्ञान का इस्तेमाल कर विज्ञापनों से मुनाफा बढ़ाने का आरोप लगाया गया है।
इस मामले को ‘बेलवेदर ट्रायल’ यानी मार्गदर्शक मुकदमा माना जा रहा है, जो भविष्य के ऐसे मामलों के लिए मिसाल बन सकता है। आने वाली पीढ़ी को डिजिटल लत से मानसिक रूप से बीमार होने से बचाने के लिए अब सख्त नियम बनाना समय की जरूरत है।