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जयशंकर सिंह भदौरिया संवाददाता, बांका, बिहार *परिवारवाद से बिखरता समाज*

बांका,14 फरवरी 2026:कभी परिवार वह वृक्ष था जिसकी छांव में समाज सांस लेता था।उस छांव में स्नेह की ठंढक थी, त्याग की सुगंध थी और साझेपन की नमी थी।पर अब वही वृक्ष अपने ही घेरे में सिमटता जा रहा है, शाखाएं भीतर की ओर मुड़ रही हैं,जड़ों का रस सीमित हो गया है और समाज की धरती सूखने लगी है।
परिवारवाद की यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे रिश्तों के अर्थ बदल रही है। जहां पहले "हम" की ध्वनि गूंजती थी, वहां अब "मैं" की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। संयुक्त परिवारों के आंगन टूटकर छोटे-छोटे कमरों में बंट गए हैं, संवाद की खिड़कियां बंद हो रही हैं और विश्वास की रोशनी धुंधली पड़ती जा रही है।हर घर अपनी चारदीवारी को ही संसार मान बैठा है,मानो पड़ोस, समुदाय और समाज उससे परे कोई अर्थ नहीं रखते।
इस संकुचन का असर केवल रिश्तों तक सीमित नहीं रहा; यह सामाजिक न्याय और अवसरों की समानता को भी प्रभावित कर रहा है।जब निर्णय परिवार के घेरे में सिमटते हैं तब प्रतिभा की जगह पक्षपात पनपता है और योग्यता की आवाज दब जाती है। ऐसे में समाज का संतुलन डगमगाने लगता है मानो किसी नदी का प्रवाह रुककर छोटे-छोटे पोखरों में बिखर गया हो।
फिर भी आशा का दीप पूरी तरह बुझा नहीं है। यदि परिवार अपने भीतर के दरवाजे खोलें, "हम" को फिर से "मैं" पर वरीयता दें और अपने सुख-दुख को समाज की धड़कनों से जोड़ें तो यह बिखराव सिमट सकता है। परिवार यदि फिर से संस्कारों का केन्द्र बने और समाज को अपना विस्तार माने तभी रिश्तों की दीवारों में पड़ी दरारें भर सकेंगी और एक समरस, संवेदनशील समाज का स्वप्न फिर से साकार हो सकेगा।

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