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सत्ता की हवस में 'भविष्य' की बलि: क्या 'चौथी पास' राजा ने देश को AI की दौड़ में 100 साल पीछे धकेल दिया?


— डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा, भोपाल
विशेष रिपोर्ट | भोपाल
एक तरफ दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की चौथी औद्योगिक क्रांति के रथ पर सवार होकर भविष्य लिख रही है, वहीं दूसरी तरफ भारत का 'स्वयंभू विश्वगुरु' चुनावी घोड़ों पर सवार होकर राज्यों को हड़पने की हवस में मशगूल है। जिस समय अमेरिका और चीन करोड़ों-अरबों डॉलर अपनी दिमागी ताकत को सहेजने में लगा रहे थे, हमारे देश का 'महामानव' अपनी 'मंत्रिमंडलीय गैंग' के साथ गली-कूचों के चुनावों में व्यस्त था।

वो हीरा जिसे भारत ने खो दिया
आज पूरी दुनिया जिस ChatGPT और AI मॉडल्स पर फिदा है, उसकी नींव रखने वाले आशीष वासवानी भारतीय हैं, IIT की देन हैं। लेकिन अफ़सोस! 2015-16 में जब उन्हें भारतीय सत्ता और कॉर्पोरेट्स के सहयोग की जरूरत थी, तब 'साहब' अपने दोस्तों—अडानी और अंबानी की तिजोरियां भरने और राज्यों में 'वोट डकैती' की योजना बनाने में व्यस्त थे। नतीजा? आज वासवानी Google Brain (अमेरिका) की शोभा बढ़ा रहे हैं। नेहरू काल से लेकर 2014 तक जिन संस्थानों ने लाखों 'वासवानी' पैदा किए, आज उन्हीं संस्थानों की कमान '12वीं पास' और '8वीं पास' मंत्रियों के हाथों में है।

बजट का 'क्रूर' मजाक: जुमला बनाम हकीकत
आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि देश के साथ कितनी बड़ी गद्दारी हुई है:
• अमेरिका का AI बजट: लगभग 78 लाख करोड़ रुपये सालाना।
• चीन का AI बजट: लगभग 39 लाख करोड़ रुपये सालाना।
• भारत का 'जुमला' बजट: मात्र 1.2 लाख करोड़ रुपये।
यानी अमेरिका से 80 गुना और चीन से 40 गुना कम! पैसा है तो सिर्फ भव्य फाइव-स्टार पार्टी दफ्तरों के लिए, विदेशी दौरों की रीलबाजी के लिए, और चुनावी रेवड़ियों के लिए। युवाओं के रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए खजाना खाली है।

चुनाव की हवस और तबाह होती पीढ़ी
2014 के बाद से प्रधानमंत्री का 80% समय सिर्फ इस बात में बीता है कि असम कैसे जीतें, महाराष्ट्र में सरकार कैसे गिराएं, और EVM मैनिपुलेशन कैसे करें। सत्ता की इस भूख ने एक पूरी पीढ़ी को बर्बाद कर दिया। लाखों सरकारी स्कूलों पर ताले लटक गए और उच्च शिक्षा का बजट लगातार कम किया गया।

कड़वा सच यह है: इस निजाम को शिक्षित और सोच-समझ रखने वाला युवा चाहिए ही नहीं। इन्हें तो वो युवा चाहिए जो इनके जहरीले सांप्रदायिक एजेंडे में फिट बैठे, जो झंडा उठाकर मंदिर-मस्जिद के नाम पर सड़कों पर नाचे और मारा जाए, ताकि ध्रुवीकरण की राजनीति चमकती रहे।

निष्कर्ष: जागने का वक्त आ गया है
मनमोहन सरकार द्वारा 2010 में शुरू किए गए UPI जैसे सिस्टम को अपना बताकर ढोल पीटने वाले 'फर्जी' तंत्र ने देश को नवाचार (Innovation) के मामले में शून्य पर ला खड़ा किया है। अगर आज भी हम इस 'चौथी पास' राजा की विनाशकारी नीतियों के खिलाफ नहीं जागे, तो आने वाली नस्लें हमें कभी माफ नहीं करेंगी। देश की पूंजी चंद पूंजीपति यारों को सौंपी जा रही है और युवाओं का भविष्य अंधकारमय गड्ढे में धकेला जा रहा है।

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