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** कितना बदल गया इंसान **

जयशंकर सिंह भदौरिया
स्वतंत्र पत्रकार, बांका(बिहार)
बांका,20 फरवरी 2026: ईसवी सन् 1954 में बनी फिल्म 'नास्तिक' के लिए कवि प्रदीप द्वारा लिखी गई यह गीत " देख तेरे दुनियां की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान" आज हू-ब-हू चरितार्थ हो रहा है।
एक समय था जब इंसान का हृदय प्रेम का सागर था। मां की गोद में सुख, पिता की डांट में प्यार और भाई-बहन के कंधों का सहारा।लोग दुखी पड़ोसी को मदद पहुंचाते थे, अनजान लोगों को रास्ता दिखाते थे।राम का वनवास हो या गोपियों संग कृष्ण की रासलीला, ये सभी मानवीय संवेदनाओं के प्रतीक हुआ करते थे।एक इंसान के बहते आंसू को पोछने के लिए अनेकों हाथ स्वत: उठ जाते थे।एक परिवार की खुशी में पूरा समाज आनन्दमय हो जाता था।तब नैतिकता समाज की धरोहर थी और करुणा उसका आभूषण।
आज इंसान भावनाओं का परिवेशी हो गया है। हृदय सूना-सूना है पर उंगलियां स्मार्टफोन के स्क्रीन पर नाचती है। परिवार व्हाट्सएप ग्रुप तक सिमट गया है जहां गुडमाॅर्निंग इमोजी से प्यार निभाया जाता है। मां की थाली अब डिलीवरी ब्वाॅय लाता है। पिता की सलाह अब 'फाॅरवर्डेड मैसेज' देता है।लालच ने भाई को भाई का दुष्मन और स्वार्थ ने दोस्ती को व्यापार बना दिया है। एकाकीपन में डूबा इंसान 'लाइक्स' से तसल्ली पा रहा है। नैतिकता बाजार में बिक रही है और करुणा तो "ट्रेंडिंग चैलेंज" बन गई है। बच्चे आईपैड पर खोए हुए हैं और वृद्धजन चुपचाप अकेलेपन का संताप झेल रहे हैं।
कितना बदल गया इंसान !!
पहले वह आत्मा का दर्पण था, लेकिन अब मास्क का एक पुतला भर रह गया है।अब भी मानवीयता जागृत हो सकती है।एक मुस्कान, एक स्पर्श, एक सच्चा संवाद में सभी पुरानी जड़ें हैं। ध्यान और आत्मचिंतन से वह लौट सकता है बस जरूरत है हृदय की पुकार सुनने की। इंसान बदल गया है पर 'मानवता' जो उसका मूल है वह आज भी अटल है।

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