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राह देखते रहे दिव्यांगजन:बजट में पेंशन वृद्धि की आस बनी हताशा

मध्य प्रदेश में दिव्यांगजन - पिछले एक दशक से मात्र 600 रुपये मासिक पेंशन पर जीवन यापन कर रहे हैं, जबकि बढ़ती महंगाई ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। हालिया बजट 2026-27 में भी कोई ठोस वृद्धि न होने से वे गहरी निराशा में डूबे हैं। हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर होने के बावजूद सरकार की उदासीनता एक मार्मिक सवाल खड़ा करती है— क्या दीन-दुखियों का पहला हक, वोट बैंक पर भारी पड़ रहा है? दिव्यांगों की दयनीय स्थिति मध्य प्रदेश में अनुमानित 25 लाख से अधिक दिव्यांग जन हैं।

लेकिन यूनिक डिसेबिलिटी आईडी कार्ड केवल 9.49 लाख के पास है। इनमें से हजारों पेंशन पर निर्भर हैं, जिनके हाथ-पैर कमजोर हैं, आंखें नहीं देखतीं या बुद्धि प्रभावित है। 600 रुपये मासिक पेंशन से न तो दवा-इलाज हो पाता है, न भोजन। 2011 जनगणना के अनुसार राज्य में 15.52 लाख दिव्यांग थे, जिनमें 40 प्रतिशत से अधिक गंभीर रूप से प्रभावित हैं। बढ़ती मुद्रास्फीति ने इस राशि को पूरी तरह अपर्याप्त बना दिया है। पेंशन का काला इतिहास पिछले 10 वर्षों से मध्य प्रदेश में दिव्यांग पेंशन 600 रुपये पर अटकी हुई है।

केंद्र सरकार की नारी शक्ति वंदन योजना या अन्य राज्यों जैसे हरियाणा में 2500 रुपये तक वृद्धि हुई, लेकिन एमपी में कोई बदलाव नहीं हुआ।
2023 चुनाव घोषणापत्र में भाजपा ने 1500 रुपये का वादा किया था, जो अब तक अधूरा है। सामाजिक सुरक्षा पेंशनों पर राज्य प्रतिमाह 325 करोड़ रुपये खर्च करता है, जिसमें 53 लाख हितग्राही शामिल हैं, लेकिन दिव्यांगों का हिस्सा बेहद सीमित है।

बजट 2026: आस बनी धोखा-

फरवरी 2026 के बजट (कुल 4.38 लाख करोड़) में सामाजिक सुरक्षा पर फोकस दिखाया गया, लेकिन दिव्यांग पेंशन में कोई वृद्धि का ऐलान नहीं हुआ। मंत्री नारायण सिंह कुशवाह ने दिसंबर 2025 में वृद्धि का प्रस्ताव पारित किया था, फिर भी बजट में इसे शामिल न किया गया। केंद्र बजट में दिव्यांग योजनाओं पर कुछ घोषणाएं हुईं, लेकिन राज्य स्तर पर विलंब जारी है। हाईकोर्ट ने जनवरी 2026 में सरकार से जवाब मांगा है, और अगली सुनवाई मार्च में होगी। न्यायिक हस्तक्षेप और आंदोलन हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें दिव्यांग अधिकार अधिनियम 2016 की धारा 24 का हवाला देकर कम से कम 1562 रुपये पेंशन की मांग की गई है। कोर्ट ने सरकार को नोटिस जारी किया है।

दिव्यांग संगठन सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं और मंत्रियों से वादे ले चुके हैं, लेकिन अमल नहीं हो रहा। अन्य राज्य जैसे उत्तर प्रदेश में 11 लाख लाभार्थी 1000 रुपये से अधिक पा रहे हैं।वोट बैंक बनाम वास्तविक हक सरकार रेवड़ियां बांट रही हैं—लाडली बहन योजना में 1500 रुपये, लेकिन दिव्यांग को वही पुराना 600 रुपये। विधायकों का वेतन 200 से बढ़कर 1.10 लाख हो गया, लेकिन पेंशनरों की अनदेखी हो रही है। दीन-दुखी की सेवा राजनीति का विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक कर्तव्य है। अनुच्छेद 41 में कमजोर वर्गों के लिए राज्य की सहायता का स्पष्ट प्रावधान है।

कम से कम 1500-2000 रुपये पेंशन से सम्मानजनक जीवन संभव हो सकता है। उम्मीद की किरण?मंत्री ने परामर्शदात्री समिति में वृद्धि का प्रस्ताव पारित किया है और तहसील स्तर पर शिविरों का ऐलान किया है। 17,503 दिव्यांगों को सहायक उपकरण वितरित किए गए हैं।

लेकिन बजट की चुप्पी ने सभी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। सरकार को हाईकोर्ट के निर्देशों का सम्मान करना चाहिए। दिव्यांग 'पर्वत' की तरह मजबूत हैं, लेकिन सहारे की सख्त जरूरत है। यदि पेंशन 1500 रुपये हो जाए, तो दवा-इलाज और भोजन की व्यवस्था हो सकेगी।सामाजिक न्याय की पुकारदिव्यांगजन कोई वोट बैंक नहीं, बल्कि समाज का अभिन्न अंग हैं।

मध्य प्रदेश के 25 लाख दिव्यांगों की आवाज को दबाया न जाए। सरकार का गठन दीन-दुखियों की सेवा के लिए होता है, न कि रेवड़ियां बांटने के लिए। पेंशन वृद्धि से लाखों जिंदगियां संवर सकती हैं।
अब समय है जागने का — न्याय मिले, वरना हताशा और गहरा जाएगी।

हिम्मत सिंह तंवर
राष्ट्रीय अध्यक्ष,
दिव्यांग कल्याण एवं विकास परिषद

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