logo
Select Language
Hindi
Bengali
Tamil
Telugu
Marathi
Gujarati
Kannada
Malayalam
Punjabi
Urdu
Oriya

The Hans Foundation का बनाग्नि जागरूकता अभियान बमोली, गूम डांगू और कंडाखणी खाल में नुक्कड़ नाटक के माध्यम से ग्रामीणों को किया जागरूक


बमोली/पौड़ी गढ़वाल।
पर्वतीय क्षेत्रों में गर्मियों के मौसम के साथ बढ़ती वनाग्नि की घटनाओं को देखते हुए द हंस फाउंडेशन द्वारा व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाया गया। इस क्रम में ग्राम बमोली, गूम डांगू और कंडाखणी खाल में नुक्कड़ नाटक के माध्यम से ग्रामीणों को बनाग्नि से बचाव एवं सुरक्षा उपायों की जानकारी दी गई। कार्यक्रम का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि जनसहभागिता के माध्यम से स्थायी समाधान की दिशा में समाज को सक्रिय करना था।
वनाग्नि: पर्यावरण और आजीविका पर संकट
कार्यक्रम की शुरुआत में वक्ताओं ने बताया कि वनाग्नि केवल पेड़ों और वन संपदा को ही नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि जल स्रोतों के सूखने, जैव विविधता के नष्ट होने और ग्रामीणों की आजीविका पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है। पहाड़ी क्षेत्रों में वन ही जल, जलवायु संतुलन और कृषि व्यवस्था का आधार हैं। ऐसे में छोटी-सी लापरवाही भी बड़े संकट का कारण बन सकती है।
नुक्कड़ नाटक बना जागरूकता का प्रभावी माध्यम
पराज सांस्कृतिक समिति के कलाकारों—संदीप छिलवट, हर्षपति रायल एवं उनके सहयोगी कलाकारों—ने हास्य, व्यंग्य और लोक शैली में सशक्त प्रस्तुति दी। नाटक में दर्शाया गया कि किस प्रकार जंगल में जलती बीड़ी फेंकना, पिकनिक के दौरान आग जलाकर छोड़ देना या सूखी घास में कूड़ा जलाना बड़ी वनाग्नि का रूप ले लेता है।
कलाकारों ने संवादों के माध्यम से यह संदेश दिया कि—
“जंगल हमारी धरोहर हैं, इन्हें बचाना हमारी जिम्मेदारी है।”
नाटक के दौरान ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी भी देखने को मिली। कई स्थानों पर दर्शकों ने कलाकारों के साथ संवाद स्थापित कर अपने अनुभव साझा किए।
सीडीएस सतीश बहुगुणा का विस्तृत संबोधन
द हंस फाउंडेशन के सीडीएस सतीश बहुगुणा ने अपने संबोधन में कहा कि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में वन केवल प्राकृतिक संपदा नहीं, बल्कि जीवनरेखा हैं। उन्होंने कहा—
“वनाग्नि की एक घटना वर्षों की हरियाली और प्राकृतिक संतुलन को समाप्त कर सकती है। हमें यह समझना होगा कि आग केवल जंगल नहीं जलाती, बल्कि हमारे बच्चों का भविष्य भी प्रभावित करती है। अगर हम सामूहिक रूप से सतर्क रहें और छोटी-छोटी सावधानियां बरतें, तो बड़ी आपदाओं को रोका जा सकता है।”
उन्होंने ग्रामीणों से अपील की कि वे जंगलों में किसी भी प्रकार की आग जलाने से बचें, पशु चराई के दौरान सतर्क रहें और आग लगने की स्थिति में तुरंत संबंधित विभाग को सूचना दें। उन्होंने यह भी कहा कि द हंस फाउंडेशन का उद्देश्य केवल सेवा गतिविधियां संचालित करना नहीं, बल्कि समुदाय को आत्मनिर्भर और जागरूक बनाना है ताकि वे स्वयं अपने संसाधनों की रक्षा कर सकें।
अधिकारियों एवं गणमान्य व्यक्तियों की सहभागिता
कार्यक्रम में ब्लॉक कोर्डिनेटर रोहित सिंह ने कहा कि वनाग्नि रोकथाम के लिए गांव स्तर पर निगरानी समितियों का गठन आवश्यक है। मोटिवेटर संगीता देवी ने महिलाओं की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि महिला समूह यदि आगे आएं तो जागरूकता अभियान और अधिक प्रभावी हो सकता है।
समाजसेवी एवं वरिष्ठ पत्रकार जयमल चंद्रा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि पर्यावरण संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा—
“प्रकृति हमें जीवन देती है, इसलिए उसका संरक्षण हमारा नैतिक कर्तव्य है। जागरूक समाज ही सुरक्षित समाज का निर्माण करता है।”
उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे सोशल मीडिया और स्थानीय मंचों के माध्यम से भी वन संरक्षण का संदेश फैलाएं।
ग्रामीणों ने लिया संकल्प
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से संकल्प लिया कि वे जंगलों में आग से संबंधित किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं बरतेंगे तथा दूसरों को भी इसके प्रति जागरूक करेंगे।
ग्रामीणों ने द हंस फाउंडेशन की इस पहल की सराहना करते हुए भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने का आग्रह किया।
यह जागरूकता अभियान क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के प्रति सकारात्मक संदेश देने के साथ-साथ सामुदायिक सहभागिता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहा है।

5
145 views

Comment