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झारखंड में गांधी का आगमन: आज़ादी की चेतना जगाने वाले ऐतिहासिक दौरे--

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी ने केवल बड़े शहरों तक ही अपने आंदोलन को सीमित नहीं रखा, बल्कि देश के दूरस्थ क्षेत्रों में जाकर जनजागरण किया। 1917 से 1940 के बीच उन्होंने वर्तमान झारखंड क्षेत्र का कुल 12 बार दौरा किया। इन यात्राओं ने यहाँ के समाज, आदिवासी चेतना, श्रमिक आंदोलनों और स्वदेशी भावना को नई दिशा दी।
गांधी पहली बार 3 जून 1917 को रांची झारखंड पहुँचे स्थानीय समाजसेवी श्याम किशोर सहाय के निमंत्रण पर वे स्वतंत्रता सेनानी ब्रज किशोर प्रसाद के साथ यहाँ आए।
4 से 6 जून तक उन्होंने तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर अल्बर्ट गेट से लगातार बैठकें कीं। यह वही समय था जब चंपारण सत्याग्रह की जाँच चल रही थी और गांधी किसानों की पीड़ा को प्रशासन के सामने रख रहे थे।
दूसरी यात्रा 7 जुलाई 1917जनसंपर्क और जाँच समिति की बैठकों में भागीदारी के लिये रांची झारखंड आये।यहा वे 13 जुलाई तक रहे।
तीसरी यात्रा 22 सितम्बर–4 अक्टूबर 1917 तक गांधी सत्याग्रह संबंधी ऐतिहासिक रिपोर्ट पर हस्ताक्षर कर अंग्रेजी शासन को चुनौती दी। बाद में वे मोतीहारी लौट गए।
4 अक्टूबर 1920 को 4थी बार गांधी पुनः रांची आए और भीमराज वंशीधर धर्मशाला में ठहरे।
यहीं विदेशी वस्त्रों की सार्वजनिक होली जलाई गई—स्वदेशी आंदोलन का प्रतीकात्मक क्षण। इसी दौरान उन्होंने टाना भगत समुदाय से मुलाकात कर उन्हें “सर्वोत्कृष्ट अनुयायी” कहा।
5 फरवरी 1921 को 5वीं बार वे कोष-संग्रह हेतु धनबाद पहुँचे और झरिया में विशाल सभा को संबोधित किया।
8 अगस्त 1925 को 6ठी बार गांधी जमशेदपुर झारखंड पहुँचे, जहाँ टाटा उद्योग और मजदूर संगठनों के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद को सुलझाने में उन्होंने निर्णायक भूमिका निभाई।यहाँ उनके साथ जवाहरलाल नेहरू और डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी जुड़े और आगे की रणनीति पर विचार हुआ।
सातवीं बार 15 सितम्बर 1925 का दौरा विशेष रूप से जनजातीय क्षेत्रों के संपर्क का था—
पुरुलिया से चक्रधरपुर आये और चाईबासा में हो समाज से संवाद किये।खूँटी में मुंडा समुदाय से मुलाकात की 17सितम्बर को हजारीबाग के कर्ज़न ग्राउंड में सभा को सम्बोधित किये।उन्होंने विद्यार्थियों, ग्रामीणों और आदिवासियों में स्वराज, शिक्षा और आत्मसम्मान का संदेश दिया।
आठवीं बार 3 अक्टूबर 1925 को गांधी देवघर पहुँचे। मंदिर दर्शन के बाद वे ग्रामीण क्षेत्रों में गए और सामाजिक एकता पर बल दिया।
इसके बाद गिरिडीह और मधुपुर में महिलाओं और नागरिकों को संबोधित किया तथा एक टाउन हॉल का उद्घाटन किया।
अपने पत्र Young India में उन्होंने देवघर की परंपराओं की प्रशंसा करते हुए लिखा कि वहाँ जात-पात और छुआछूत से ऊपर उठकर सामाजिक व्यवहार देखने को मिला।
9वीं बार 11 जनवरी 1927 को गांधी ने पलामू क्षेत्र में विशाल सभा को संबोधित किया।
इसके बाद धनबाद-झरिया क्षेत्र और कतरास में महिलाओं की रैली में भाग लेकर स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका पर बल दिया।
26 अप्रैल 1934 को 10वीं बार जसीडीह पहुँचने पर उन पर जानलेवा हमला हुआ, लेकिन वे सुरक्षित बच गए।
इस यात्रा में स्थानीय स्वतंत्रता सेनानी होपन माँझी ने संथाल समुदाय को आंदोलन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
करमाटांड़ के गोवीटांड़ मैदान में ऐतिहासिक भाषण
बेरमो में महिलाओं को संबोधन, जामाडोबा में कोलियरी मजदूरों से संवाद कर रांची लौटकर उन्होंने अनेक राष्ट्रीय नेताओं—सी. राजगोपालाचारी, अरुणा आसफ अली, सरोजिनी नायडू, जमनालाल बजाज और भुलाभाई देसाई—के साथ आंदोलन की रणनीति तय की।
14 मार्च 1940 को 11वीं बार गांधी रामगढ़ में आयोजित कांग्रेस के 53वें अधिवेशन में शामिल हुए और खादी प्रदर्शनी का उद्घाटन किया।
यहाँ उन्होंने स्वावलंबन और ग्रामोद्योग को स्वतंत्रता की आधारशिला बताया।
29 अगस्त 1940 को व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान वे अंतिम बार रांची आए—यह उनका झारखंड का 12वाँ और अंतिम दौरा था।
गांधी के इन दौरों ने झारखंड में कई स्थायी परिवर्तन किए—
आदिवासी समाज में राजनीतिक चेतना का विस्तार,स्वदेशी और खादी का व्यापक प्रचार,श्रमिक आंदोलनों को नैतिक दिशा,महिलाओं की सक्रिय भागीदारी,सामाजिक समरसता और अस्पृश्यता विरोधी विचारों का प्रसार।
झारखंड का स्वतंत्रता आंदोलन केवल राष्ट्रीय धारा का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि गांधी के प्रत्यक्ष संपर्क से यहाँ जन-आधारित जागरण विकसित हुआ।
1917 से 1940 के बीच गांधी के 12 झारखंड दौरे केवल यात्राएँ नहीं थे, बल्कि स्वराज, सामाजिक सुधार और जनजागरण की चलती हुई पाठशाला थे।
झारखंड की धरती ने गांधी को जनशक्ति का विश्वास दिया, और गांधी ने इस क्षेत्र को स्वतंत्रता संघर्ष की मुख्यधारा से जोड़ा।
नरेंद्र

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