logo
Select Language
Hindi
Bengali
Tamil
Telugu
Marathi
Gujarati
Kannada
Malayalam
Punjabi
Urdu
Oriya

आदर्श पत्रकारिता में शुचिता के पर्याय थे – भगवान दास बंसल "बाबूजी"

💐श्रद्धांजली
_____________________
मैं स्वयं भी पत्रकारिता से जुड़ा रहा हूँ। गाँव के छोटे से पत्रकार से लेकर राष्ट्रीय स्तर के पत्रकारों तक संवाद स्थापित करने का अवसर मुझे मिला है। पत्रकारिता के अनेक स्वरूप देखे, अनेक प्रवृत्तियाँ देखीं, लेकिन पत्रकारिता की जो गहराई, जो नैतिक स्पष्टता और जो संवेदनशील दृष्टि मैंने बंसल बाबूजी में देखी, वह अत्यंत दुर्लभ थी।

वे भले ही किसी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की औपचारिक डिग्री प्राप्त किए हुए न थे, परंतु पत्रकारिता उनके स्वभाव में बसती थी। उनके लिए समाचार केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व था। वे एक छोटी-सी खबर पर भी प्रश्नों की झड़ी लगा देते थे— कब? क्यों? कहाँ? कैसे? किसने? किसके लिए? जब तक हर प्रश्न का संतोषजनक उत्तर न मिल जाए, वे समाचार को आगे नहीं बढ़ाते थे।

वे कहते थे — “समाचार वही जो सत्य पर आधारित हो, प्रमाण सहित हो और पारदर्शी हो।”
आज जब कई बार समाचार आग्रह और प्रभाव के आधार पर चलाए जाते हैं, तब बंसल बाबूजी निष्पक्ष पत्रकारिता के नायाब हीरे थे।

अक्सर मैं बाजार से आते-जाते समय उनके पास बैठ जाया करता था। हमारे संवाद अत्यंत मधुर और सारगर्भित होते थे। वे मुझे स्नेहपूर्वक “आचार्य जी” कहकर बुलाते थे। उन्हें ज्ञात था कि मैं शासकीय शिक्षक हूँ, फिर भी वे कहते थे — “बात करना सीखें तो कोई आपसे सीखे।” यह उनका उदार व्यक्तित्व था, जो सामने वाले के गुणों को सम्मान देता था।

उनकी जीवन-दृष्टि का एक प्रसंग आज भी मेरे हृदय में अंकित है। एक बार बच्चों के एक उत्सव हेतु कुछ सामग्री की सूची मुझे देनी थी। जल्दबाजी में कागज न मिलने पर मैंने 50 पैसे के एक नए पोस्टकार्ड पर सूची लिख दी। जब वह पोस्टकार्ड मैंने उन्हें दिया, तो उन्होंने उसे पलटकर देखा और कहा —
“जानते हो, यह 50 पैसे का है। तुमने इसे यूँ ही खर्च कर दिया। यहाँ हम दिनभर एक-एक पैसे के लिए बैठते हैं, तब जाकर हजार-पाँच सौ रुपये बनते हैं। एक-एक पैसे से ही पचास पैसे बनते हैं।”

उनकी यह बात मेरे अंतर्मन तक उतर गई। उस दिन मुझे समझ में आया कि सादगी में भी कितनी गहराई होती है। जो व्यक्ति दुकान पर बैठा है, वह केवल व्यापारी नहीं, बल्कि जीवन का गहन दार्शनिक भी है। संसाधनों का सम्मान, श्रम का मूल्य और हर छोटे तत्व की महत्ता — यह मैंने उनसे सीखा।
निवाली जैसे छोटे क्षेत्र में उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में जो सम्मान अर्जित किया, वह अद्वितीय है। उनका जाना केवल एक व्यक्ति की क्षति नहीं, बल्कि एक मूल्यपरक परंपरा की अपूर्ण क्षति है।

आज मैं हृदय से उन्हें नमन करता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि उनकी पुण्यात्मा को परम शांति प्रदान करें तथा अपने श्रीचरणों में स्थान दें। उनके आदर्श, उनका स्नेह और उनका आशीर्वाद सदैव हम सबके मार्ग को आलोकित करता रहे — यही मेरी भावपूर्ण कामना है।

विनम्र श्रद्धांजलि सहित

चतरसिंह गेहलोत
शिक्षक | साहित्यकार | सामाजिक कार्यकर्ता
मो. 9993803698

154
60 views

Comment