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सूनापन बाहर कम, अन्दर ज़्यादा

डाली से टूट कर गिरते हुए पत्ते का अचानक हवा में बने मकड़ी के जाले में फंस जाना मुझे बहुत ही गहरी सोच में डाल गया। कुछ वक़्त पहले ज़िन्दगी की भागम भाग इतनी ज़्यादा और मसरूफियत भरी थी कि एक पल की रुकावट में उन पल को खोजते हुए इतने उलझ जाते रहे कि लगने लगा था क्या इंसानियत और जज्बातों का अंजाम ऐसा ही लिखा गया है। 

भीड़ भरी मसरूफ ज़िन्दगी में भी शोर मचाता हुआ सन्नाटा और महफिलों से सराबोर मानवीय मन में भीड़ से घिरा हुआ सूनापन। आखिर यह सब क्या है, क्यों है..? टेक्नोलॉजी ने हमें एक दूसरे से जोड़ा मीलों के फासले होते हुए भी और हम टेक्नोलॉजी को ही नहीं जोड़ सके अपने अन्दर बढ़ रहे मीलों के फासले बढ़ते वक़्त। हम सब गली मुहल्ले गांव शहरों में रहते जरूर हैं, पर हमारी मनोस्थिति तो उन चीटियों के झुंड से भी गई गुजरी है जो भीड़ में से अलग होते हुए एक दूसरे से जुड़ी रहती हैं। 

हमारी हालत तो ऐसी है कि आस-पड़ोस में क्या हुआ, इसकी जानकारी हमें अपने सोशल मीडिया से पता चलती है तो पुष्टि करने वहां जाते हैं। कई दशकों की इस जद्दोज़हद में अचानक से हुए इस बदलाव ने मानवीय मनोस्थिति को झंझोड़ कर रख दिया है। यहां पर एक व्यक्ति किसी के पास इसलिए दस मिनट बैठने से कतराता था कि उसके कार्यप्रणाली में कोई बाधा पड़ेगी या फिर उसका आर्थिक नुकसान हो सकता है और एक दिन का जरूरत के मौके पर लिए हुए अवकाश का भी हर्जाना भरने वाला व्यक्ति किसी के पास चंद पलों का भी त्याग देने से कतराता रहा, ताकि इसका हर्जाना उस अपने वेतन में कटौती से चुकाना पड़ेगा। 

बिना बात के उलझनों में अपने आप को इतना मसरूफ कर रक्खा था कि एक विदेशी महामारी ने आते ही असल आइना दिखा दिया कि ज़िन्दगी की जरूरत दो वक्त की रोटी है, बाकी सब तो दिखावा करने मात्र से करते आ रहें हैं। पैसे की कमी का डर आज भी बहुत है, पर उस बात का नहीं कि कोई हर्जाना भरना पड़ेगा, बल्कि इस बात का है कि कब तक यूंही तर्क वितर्क से जूझता हुआ दिन बसर करूंगा। रोज़ मर्रा की व्यस्तता थी तो शिकायत थी कि ज़िन्दगी में इतना हाशिया भी नहीं कि अपनी के संग अच्छी तरह से कुछ समय व्यतीत कर सकूं और अब जब हाशिया इतना लंबा मिल गया, सब साथ बैठते, बातें करते, टीवी देखते, खाना खाते हैं, मानो सारी शिकायितों की सुनवाई हो गई हो। मगर कुछ समय के बाद अचानक से गिरते हुए बचत के आंकड़ों और बढ़ते हुए बजट की चिंता सताना शुरू कर देती है तो अपनों के साथ समय व्यतीत करते हुए मन इसी असमंजस में रहता है कि, ‘मैं खुश तो हूं पर खुशी क्यों नहीं है..? परिवार जनों के साथ तो हूं पर लगाव क्यों नहीं है..? ज़िन्दगी घर में ही रुकी हुई तो है पर टिकाव क्यों नहीं है..?

चूंकि भले हमें हालातों से, परिस्थितियों से शिकायतें रहती हैं, पर हम अपने दायरे के दरमियान आते हुए अपने दिल के रिश्ते, दोस्ती के रिश्ते, रोज़गार के रिश्ते और सफ़र के रिश्तों को कभी झुठला नहीं सकते। घर हमारा केन्द्र बिन्दु है, पर यह सब हमारा दायरा है जिसकी डोर केन्द्र बिंदु से शुरू होती है और हमें सबसे जोड़े रखती है। इसीलिए इतने आरामदायक दिशा निर्देशों के होते हुए भी हम आराम में नहीं और शायद इसीलिए सूनापन बाहर कम अन्दर ज़्यादा है।

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