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जीवन मौलिक, धर्म-विज्ञान मौलिक नहीं। जीवन का सिद्धांत:

जीवन मौलिक, धर्म-विज्ञान मौलिक नहीं।
जीवन का सिद्धांत:

वेदांत 2.0 life सिद्धांत है—वह व्यक्ति जो विज्ञान और धर्म दोनों को प्राथमिक रखता है, श्रेष्ठ नहीं बनाता, वही राम है। उसका जीवन स्वर्ग है।

लेकिन जो इन दोनों को श्रेष्ठ मान लेता है, वह रावण बन जाता है और जीवन को नर्क कहलाने लायक बना देता है।

जीवन सरल और बेहतर दोनों से संभव है। जैसे सिर पर ताज लगाना सुंदर लगता है, लेकिन ताज सत्य नहीं। जीवन के कपड़े प्राथमिक हैं—यदि जीवन में पानी भोजन नहीं तब जीवन नहीं है, लेकिन कपड़े अधिक महत्वपूर्ण हो जाएँ तो जीवन छोटा और कपड़ा बड़ा हो जाता है।
जिसने धर्म और विज्ञान को लक्ष्य बना लिया कि 'बिना इनके जीवन नहीं', वह सिद्ध करता है कि जीवन को कभी समझ ही नहीं पाया, जी ही नहीं पाया।
वह नया नर्क खड़ा कर देता है।जीवन प्रकृति से जुड़ा है। हर तैयारी आवश्यक है, थोड़ा उपभोग ठीक है। लेकिन उपभोग को ही जीवन बना दिया तो राम की समझ असंभव—वह रावण ही बनेगा।
जीवन जीने से बड़ा कोई ईश्वर, भगवान या विज्ञान नहीं। जीवन ही केंद्र है। जिसने केंद्र में खड़े होकर जीवन जिया, वही मोक्ष, आनंद, समाधि, शांति, प्रेम और स्वर्ग का जीवन पाता है।वेदांत 2.0 यही कहता है: जीवन जीना सत्य है, लेकिन बिना विज्ञान बिना धर्म के भी जीवन जीना संभव है दोनो के जीतने आश्रित बनते है उतना बड़ा बंधन नर्क ओर जीवन दूर हो जाते है जीवन स्वयं ईश्वर की यात्रा है।

ज्ञान जीवन का होना चाहिए, फिर शिक्षा विज्ञान धर्म है, जीवन मौलिक है. धर्म विज्ञान मौलिक नहीं है।

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