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भ्रष्टाचार का नया मॉडल: बैतूल की बाकुड़ पंचायत में 'साइन' नहीं, 'सेटिंग' से पास होते हैं लाखों के बिल!

"गिट्टी सड़क पर उतरी या सिर्फ कागजों में? 'अदृश्य स्याही' वाले इस फर्जीवाड़े के बाद सरपंच और सचिव की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल"

"ग्रामीणों ने कसा तंज- "काम कम, कागज ज्यादा", बाकुड़ पंचायत में कागजी विकास की उच्च स्तरीय जांच की मांग तेज"

बैतूल/घोड़ाडोंगरी। सरकारी दफ्तरों की लालफीताशाही से आम आदमी भली-भांति वाकिफ है। एक आम नागरिक को अपना एक छोटा सा काम करवाने या एक आवेदन पर मुहर लगवाने के लिए दर्जनों चक्कर काटने पड़ते हैं और कई बाबुओं की चिरौरी करनी पड़ती है। लेकिन, अगर आपको यह देखना हो कि सरकारी सिस्टम में 'जादू' कैसे होता है, तो आपको बैतूल जिले की जनपद पंचायत घोड़ाडोंगरी के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत बाकुड़ का रुख करना चाहिए।

यहां के भ्रष्ट तंत्र ने ऐसा कारनामा कर दिखाया है जो किसी को भी हैरान कर दे— बिना किसी जिम्मेदार अधिकारी या जनप्रतिनिधि के हस्ताक्षर के ही 1 लाख 89 हजार रुपये का बिल तैयार कर लिया गया! यह महज एक कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि पंचायत स्तर पर पनप रहे भ्रष्टाचार और अंधेरगर्दी का जीता-जागता सबूत है।

क्या है पूरा मामला?

जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत बाकुड़ के अंतर्गत आने वाले ग्राम फांडका में एक कल्वर्ट (पुलिया) निर्माण का कार्य दर्शाया गया है। इसी निर्माण कार्य में गिट्टी सप्लाई के नाम पर 1,89,000 रुपये का एक भारी-भरकम बिल सरकारी फाइलों का हिस्सा बन गया।
बिल में रकम तो पूरी ईमानदारी और सफाई से लिखी गई है, लेकिन जब इस सरकारी दस्तावेज की बारीकी से पड़ताल की गई, तो सबसे अहम चीज ही नदारद मिली— हस्ताक्षर! बिना किसी पंचायत सचिव, सरपंच या उपयंत्री के हस्ताक्षर के यह बिल न सिर्फ तैयार हुआ, बल्कि फाइलों में अपनी जगह भी बना चुका है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर बिना किसी प्रमाणीकरण के लाखों रुपये का यह हिसाब किस 'अदृश्य शक्ति' के भरोसे तैयार हो गया?

ग्रामीणों का तंज: "यहां कागजों पर बुलेट ट्रेन की रफ्तार से दौड़ता है विकास"

इस बिना हस्ताक्षर वाले बिल का खुलासा होने के बाद से पूरे गांव में आक्रोश और चर्चा का माहौल है। ग्रामीण अब पंचायत की कार्यप्रणाली पर तीखा व्यंग्य कर रहे हैं। लोग मजे लेते हुए कह रहे हैं कि शायद बाकुड़ पंचायत के अधिकारी किसी खास 'अदृश्य स्याही' का इस्तेमाल करते हैं, जो आम जनता को दिखाई नहीं देती, लेकिन फंड पास करने वाले आकाओं को साफ नजर आती है। यह जुमला गांव में आम हो गया है कि इस पंचायत में काम करवाने के लिए पेन और दस्तखत की नहीं, बल्कि ऊपर तक की 'सेटिंग' की दरकार होती है। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि जमीन पर विकास भले ही रेंग रहा हो, लेकिन कागजों पर यह बुलेट ट्रेन की रफ्तार से दौड़ रहा है।

अधिकारियों का गुरूर और मिलीभगत की बू

यह मामला सिर्फ एक 'तकनीकी भूल' (Clerical Error) कहकर नहीं टाला जा सकता। सूत्रों की मानें तो पंचायत के जिम्मेदार अधिकारी इन दिनों सत्ता और रसूख के नशे में हैं। वे गांव में खुलेआम यह दावा करते फिरते हैं कि "उनकी ऊपर तक मजबूत पकड़ है" और जनपद स्तर के बड़े अधिकारी उनकी मुट्ठी में हैं। अगर इन दावों में जरा भी सच्चाई है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि बिना हस्ताक्षर के बेखौफ तरीके से लाखों के बिल बनना कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित भ्रष्टाचार का हिस्सा है।

जांच की उठती मांग

स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अब इस पूरे फर्जीवाड़े पर मोर्चा खोल दिया है। उनकी मांग है कि इस 1.89 लाख रुपये के बिल की तत्काल और निष्पक्ष जांच हो। यह पता लगाया जाए कि क्या इस फर्जी बिल के आधार पर सरकारी खजाने से भुगतान की प्रक्रिया को भी अंजाम दिया गया है? जिम्मेदार पंचायत सचिव और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

अगर इस मामले की गहराई से जांच होती है, तो बाकुड़ पंचायत की फाइलों में दबे ऐसे कई और 'कागजी पुलियों' और 'हवा-हवाई गिट्टियों' के बिलों का भंडाफोड़ होना तय है। अब देखना यह है कि क्या जिला प्रशासन और जनपद पंचायत के आला अधिकारी इस 'सेटिंग' वाले बिल पर कोई एक्शन लेते हैं, या फिर वे भी इस अदृश्य स्याही वाले खेल के मूकदर्शक बने रहते हैं।

इनका कहना है -

आप मुझे वह बगैर हस्ताक्षर किए वाले बिल भेज दीजिए या खबरों के माध्यम से जानकारी दे दीजिए मैं कार्यवाही करूंगा।

अक्षत जैन, जिला जनपद सीईओ बैतूल

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