10-15% उद्योगों में एक ही शिफ्ट में काम:इजराइल-ईरान युद्ध के चलते रॉ मटेरियल की कीमतें 30% तक बढ़ी; शटडाउन की बन रही स्थिति
इजराइल-ईरान युद्ध का असर अब मध्य प्रदेश के उद्योगों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे माल की कीमतें 20 से 30 फीसदी तक बढ़ गई हैं। वहीं, लॉजिस्टिक लागत भी 5 गुना महंगी हो गई है। इसका सीधा असर उत्पादन और सप्लाई पर पड़ रहा है।
एक्सपोर्ट के साथ-साथ घरेलू बाजार भी प्रभावित हो रहा है, जिससे तैयार माल की लागत बढ़ रही है और उत्पाद महंगे हो रहे हैं। कच्चे माल की कमी के कारण कुछ उद्योगों में शटडाउन की स्थिति बनने लगी है, जबकि 10 से 15 फीसदी फैक्ट्रियों अब दो की जगह एक ही शिफ्ट में काम हो रहा है।
फार्मा सेक्टर पर सबसे ज्यादा असर पड़ा
सबसे ज्यादा असर फार्मा इंडस्ट्री पर पड़ा है। उदाहरण के तौर पर, सोमवार को पैरासिटामॉल पाउडर की कीमत 290 रुपए थी। अगले ही दिन दाम 360 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गए। यानी लगभग 20 से 22 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसी तरह अन्य कच्चे माल और पैकेजिंग सामग्री, जैसे प्लास्टिक दाना और पीपी, के दाम भी तेजी से बढ़ रहे हैं।
अगर युद्ध लंबा खिंचता है और किसी भी एक जरूरी मटेरियल की आपूर्ति रुकती है, तो फैक्ट्रियों में शटडाउन की नौबत आ सकती है। फिलहाल, अगले 10 से 12 दिन तक स्थिति सामान्य रहने का अनुमान है। इसके बाद परेशानी बढ़ने की आशंका है।
बल्क में ड्रग और पेट्रोकेमिकल की आवक ठप
इंदौर एक प्रमुख औद्योगिक शहर है। यहां के पीथमपुर, सांवेर रोड और पालदा में 5600 से ज्यादा उद्योग हैं। इनमें फार्मा, केमिकल, मेटल और प्लास्टिक उद्योग कच्चे माल के लिए लगभग 60 फीसदी मिडिल ईस्ट पर निर्भर हैं।
युद्ध के चलते बहरीन, कतर और सऊदी अरब से बल्क ड्रग, पेट्रोकेमिकल और अन्य इनपुट की सप्लाई प्रभावित हुई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में दिक्कत के कारण चीन और यूरोप से आयात भी प्रभावित है। तैयार माल के निर्यात में भी मुश्किल आ रही है। कंटेनर एक्सपोर्ट का खर्च 5 गुना तक बढ़ गया है।
कहीं रॉ मटेरियल नहीं, कहीं लागत ज्यादा
पीथमपुर औद्योगिक संगठन के अध्यक्ष डॉ. गौतम कोठारी ने बताया कि उद्योगों को एक साथ दो समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कहीं कच्चा माल मिल नहीं रहा, तो कहीं बहुत महंगा हो गया है।
गैस की कमी के कारण फार्मा कंपनियों में इंजेक्शन उत्पादन प्रभावित हो रहा है। प्लास्टिक दाने की कीमत बढ़ने से कई यूनिट बंद होने की कगार पर हैं।
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10-15% उद्योगों में एक ही शिफ्ट में काम:इजराइल-ईरान युद्ध के चलते रॉ मटेरियल की कीमतें 30% तक बढ़ी; शटडाउन की बन रही स्थिति
इंदौर6 घंटे पहलेलेखक: अभिषेक दुबे
इजराइल-ईरान युद्ध का असर अब मध्य प्रदेश के उद्योगों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे माल की कीमतें 20 से 30 फीसदी तक बढ़ गई हैं। वहीं, लॉजिस्टिक लागत भी 5 गुना महंगी हो गई है। इसका सीधा असर उत्पादन और सप्लाई पर पड़ रहा है।
एक्सपोर्ट के साथ-साथ घरेलू बाजार भी प्रभावित हो रहा है, जिससे तैयार माल की लागत बढ़ रही है और उत्पाद महंगे हो रहे हैं। कच्चे माल की कमी के कारण कुछ उद्योगों में शटडाउन की स्थिति बनने लगी है, जबकि 10 से 15 फीसदी फैक्ट्रियों अब दो की जगह एक ही शिफ्ट में काम हो रहा है।
फार्मा सेक्टर पर सबसे ज्यादा असर पड़ा
सबसे ज्यादा असर फार्मा इंडस्ट्री पर पड़ा है। उदाहरण के तौर पर, सोमवार को पैरासिटामॉल पाउडर की कीमत 290 रुपए थी। अगले ही दिन दाम 360 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गए। यानी लगभग 20 से 22 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसी तरह अन्य कच्चे माल और पैकेजिंग सामग्री, जैसे प्लास्टिक दाना और पीपी, के दाम भी तेजी से बढ़ रहे हैं।
अगर युद्ध लंबा खिंचता है और किसी भी एक जरूरी मटेरियल की आपूर्ति रुकती है, तो फैक्ट्रियों में शटडाउन की नौबत आ सकती है। फिलहाल, अगले 10 से 12 दिन तक स्थिति सामान्य रहने का अनुमान है। इसके बाद परेशानी बढ़ने की आशंका है।
दवा कंपनियों के पास रॉ मटेरियल की कमी होने लगी है। - Dainik Bhaskar
दवा कंपनियों के पास रॉ मटेरियल की कमी होने लगी है।
बल्क में ड्रग और पेट्रोकेमिकल की आवक ठप
इंदौर एक प्रमुख औद्योगिक शहर है। यहां के पीथमपुर, सांवेर रोड और पालदा में 5600 से ज्यादा उद्योग हैं। इनमें फार्मा, केमिकल, मेटल और प्लास्टिक उद्योग कच्चे माल के लिए लगभग 60 फीसदी मिडिल ईस्ट पर निर्भर हैं।
युद्ध के चलते बहरीन, कतर और सऊदी अरब से बल्क ड्रग, पेट्रोकेमिकल और अन्य इनपुट की सप्लाई प्रभावित हुई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में दिक्कत के कारण चीन और यूरोप से आयात भी प्रभावित है। तैयार माल के निर्यात में भी मुश्किल आ रही है। कंटेनर एक्सपोर्ट का खर्च 5 गुना तक बढ़ गया है।
कहीं रॉ मटेरियल नहीं, कहीं लागत ज्यादा
पीथमपुर औद्योगिक संगठन के अध्यक्ष डॉ. गौतम कोठारी ने बताया कि उद्योगों को एक साथ दो समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कहीं कच्चा माल मिल नहीं रहा, तो कहीं बहुत महंगा हो गया है।
गैस की कमी के कारण फार्मा कंपनियों में इंजेक्शन उत्पादन प्रभावित हो रहा है। प्लास्टिक दाने की कीमत बढ़ने से कई यूनिट बंद होने की कगार पर हैं।
- Dainik Bhaskar
30% तक बढ़े दाम, लागत मूल्य बढ़ाना मुश्किल
7 मार्च के बाद से कच्चे माल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। प्लास्टिक उत्पादों में इस्तेमाल होने वाला वर्जिन दाना (बोतल, ढक्कन, पाइप, फुटवियर बनाने में उपयोग) 30% तक महंगा हो चुका है।
उद्योगपतियों का कहना है कि कीमत बढ़ने के बावजूद समय पर माल नहीं मिल रहा। फुटवियर उद्योग में लागत 20% तक बढ़ गई है, जबकि मुनाफा सिर्फ 5–7% है, जिससे नुकसान बढ़ रहा है।
महंगा पड़ रहा दवाओं का प्रोडक्शन
फार्मा उद्योग से जुडे़ शैलेष मीणा ने बताया कि ग्लिसरीन की कीमत 64% और पैरासिटामॉल 26% तक महंगा हो चुका है। शिपिंग में देरी, कंटेनर की कमी और बढ़े फ्रेट चार्ज भी लागत बढ़ा रहे हैं।
यूएई, सऊदी अरब और ओमान जैसे देश सस्ती दवाइयों के लिए भारत पर काफी निर्भर हैं, इसलिए इस स्थिति का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर भी पड़ सकता है। अगर युद्ध 10–15 दिन और चला तो जरूरी दवाओं की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
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10-15% उद्योगों में एक ही शिफ्ट में काम:इजराइल-ईरान युद्ध के चलते रॉ मटेरियल की कीमतें 30% तक बढ़ी; शटडाउन की बन रही स्थिति
इंदौर6 घंटे पहलेलेखक: अभिषेक दुबे
इजराइल-ईरान युद्ध का असर अब मध्य प्रदेश के उद्योगों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे माल की कीमतें 20 से 30 फीसदी तक बढ़ गई हैं। वहीं, लॉजिस्टिक लागत भी 5 गुना महंगी हो गई है। इसका सीधा असर उत्पादन और सप्लाई पर पड़ रहा है।
एक्सपोर्ट के साथ-साथ घरेलू बाजार भी प्रभावित हो रहा है, जिससे तैयार माल की लागत बढ़ रही है और उत्पाद महंगे हो रहे हैं। कच्चे माल की कमी के कारण कुछ उद्योगों में शटडाउन की स्थिति बनने लगी है, जबकि 10 से 15 फीसदी फैक्ट्रियों अब दो की जगह एक ही शिफ्ट में काम हो रहा है।
फार्मा सेक्टर पर सबसे ज्यादा असर पड़ा
सबसे ज्यादा असर फार्मा इंडस्ट्री पर पड़ा है। उदाहरण के तौर पर, सोमवार को पैरासिटामॉल पाउडर की कीमत 290 रुपए थी। अगले ही दिन दाम 360 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गए। यानी लगभग 20 से 22 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसी तरह अन्य कच्चे माल और पैकेजिंग सामग्री, जैसे प्लास्टिक दाना और पीपी, के दाम भी तेजी से बढ़ रहे हैं।
अगर युद्ध लंबा खिंचता है और किसी भी एक जरूरी मटेरियल की आपूर्ति रुकती है, तो फैक्ट्रियों में शटडाउन की नौबत आ सकती है। फिलहाल, अगले 10 से 12 दिन तक स्थिति सामान्य रहने का अनुमान है। इसके बाद परेशानी बढ़ने की आशंका है।
दवा कंपनियों के पास रॉ मटेरियल की कमी होने लगी है। - Dainik Bhaskar
दवा कंपनियों के पास रॉ मटेरियल की कमी होने लगी है।
बल्क में ड्रग और पेट्रोकेमिकल की आवक ठप
इंदौर एक प्रमुख औद्योगिक शहर है। यहां के पीथमपुर, सांवेर रोड और पालदा में 5600 से ज्यादा उद्योग हैं। इनमें फार्मा, केमिकल, मेटल और प्लास्टिक उद्योग कच्चे माल के लिए लगभग 60 फीसदी मिडिल ईस्ट पर निर्भर हैं।
युद्ध के चलते बहरीन, कतर और सऊदी अरब से बल्क ड्रग, पेट्रोकेमिकल और अन्य इनपुट की सप्लाई प्रभावित हुई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में दिक्कत के कारण चीन और यूरोप से आयात भी प्रभावित है। तैयार माल के निर्यात में भी मुश्किल आ रही है। कंटेनर एक्सपोर्ट का खर्च 5 गुना तक बढ़ गया है।
कहीं रॉ मटेरियल नहीं, कहीं लागत ज्यादा
पीथमपुर औद्योगिक संगठन के अध्यक्ष डॉ. गौतम कोठारी ने बताया कि उद्योगों को एक साथ दो समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कहीं कच्चा माल मिल नहीं रहा, तो कहीं बहुत महंगा हो गया है।
गैस की कमी के कारण फार्मा कंपनियों में इंजेक्शन उत्पादन प्रभावित हो रहा है। प्लास्टिक दाने की कीमत बढ़ने से कई यूनिट बंद होने की कगार पर हैं।
- Dainik Bhaskar
30% तक बढ़े दाम, लागत मूल्य बढ़ाना मुश्किल
7 मार्च के बाद से कच्चे माल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। प्लास्टिक उत्पादों में इस्तेमाल होने वाला वर्जिन दाना (बोतल, ढक्कन, पाइप, फुटवियर बनाने में उपयोग) 30% तक महंगा हो चुका है।
उद्योगपतियों का कहना है कि कीमत बढ़ने के बावजूद समय पर माल नहीं मिल रहा। फुटवियर उद्योग में लागत 20% तक बढ़ गई है, जबकि मुनाफा सिर्फ 5–7% है, जिससे नुकसान बढ़ रहा है।
महंगा पड़ रहा दवाओं का प्रोडक्शन
फार्मा उद्योग से जुडे़ शैलेष मीणा ने बताया कि ग्लिसरीन की कीमत 64% और पैरासिटामॉल 26% तक महंगा हो चुका है। शिपिंग में देरी, कंटेनर की कमी और बढ़े फ्रेट चार्ज भी लागत बढ़ा रहे हैं।
यूएई, सऊदी अरब और ओमान जैसे देश सस्ती दवाइयों के लिए भारत पर काफी निर्भर हैं, इसलिए इस स्थिति का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर भी पड़ सकता है। अगर युद्ध 10–15 दिन और चला तो जरूरी दवाओं की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
हर महीने 80 हजार से अधिक कंटेनर भेजे जाते हैं। - Dainik Bhaskar
हर महीने 80 हजार से अधिक कंटेनर भेजे जाते हैं।
मौजूदा हालात में ऑर्डर भेजने में परेशानी
उद्योग संगठनों के अनुसार इंदौर से प्रदेश का 40–50% एक्सपोर्ट होता है। हर महीने 80 हजार से अधिक कंटेनर कांडला और जेएनपीटी भेजे जाते हैं। वर्तमान में मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और यूरोप से फार्मा, सोया और फूड प्रोसेसिंग के बड़े ऑर्डर हैं, लेकिन उन्हें भेजने में दिक्कत आ रही है।
कंटेनर भाड़ा 4–5 गुना बढ़ गया है और इंश्योरेंस मिलना भी मुश्किल हो गया है। समुद्री और हवाई हमलों के खतरे के कारण कंपनियां बीमा देने से बच रही हैं। एयर कार्गो की क्षमता भी सीमित है।
एलपीजी की कमी, पीएनजी पर बढ़ी निर्भरता एलपीजी संकट के चलते उद्योगों को इसकी सप्लाई रोक दी गई है। एलपीजी की कमी के कारण उद्योगों को पीएनजी पर निर्भर होना पड़ रहा है, लेकिन अब कंपनियां उधार की सुविधा बंद कर चुकी हैं। गैस अब नकद या तुरंत भुगतान पर मिल रही है। जबकि पहले 7 से 15 दिन का समय मिलता था।
युद्ध लंबा चला तो उद्योगों पर गहराएगा संकट
एसोसिएशन ऑफ इंडस्ट्री के सचिव तरुण व्यास के अनुसार, 7 मार्च के बाद से कच्चे माल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, जिससे उत्पादन लागत बढ़ रही है। मांग होने के बावजूद सप्लाई प्रभावित हो रही है और जल्द ही शटडाउन की स्थिति बन सकती है।
फार्मा इंडस्ट्री और पीथमपुर औद्योगिक संगठन के डॉ. दर्शन कटारिया का कहना है कि फार्मा सेक्टर की निर्भरता केमिकल्स पर है, जो मुख्य रूप से खाड़ी देशों से आते हैं। वहां उत्पादन प्रभावित होने से कीमतें बढ़ रही हैं, हालांकि स्थिति जल्द सुधरने की उम्मीद है।
फियो के पूर्व बोर्ड सदस्य सुबेर रामपुरवाला के अनुसार, मध्य प्रदेश से मिडिल ईस्ट में फूड प्रोसेसिंग और एग्रो उत्पाद बड़ी मात्रा में निर्यात होते हैं। समुद्री भाड़ा बढ़ने और इंश्योरेंस की दिक्कतों के कारण एक्सपोर्ट प्रभावित हो रहा है।